चिरगांव जिला झांसी में जन्मे राष्ट्र कवि मैथली शरण गुप्त दद्दा का 137 वा जन्म दिवस बड़ी धूम धाम से मनाया गया।
रिपोर्टर अनुराग तिवारी पत्रकार
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चिरगांव: जिला झांसी यूपी में जन्मे राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त ने अपनी कविताओं से पूरे देश का मन मोह किया
1886 में जन्मे दद्दा जी का जन्म दिन स्कूल के बच्चो अभिभावकों प्राध्यापको ने चिरगांव नगर में बड़ी धूम धाम से मनाया और बताया कि कवि मैथिलीशरण गुप्त जी खड़ी बोली के प्रथम महत्वपूर्ण कवि थे।
आइये डालते हैं इनके जीवन परिचय पर प्रकाश इनका जन्म- 3 अगस्त, 1886 को झाँसी में हुआ था।
इन्हें साहित्य जगत में ‘दद्दा’ नाम से सम्बोधित किया जाता था।
इनकी कृति भारत-भारती भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के समय में काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी और
इसी कारण महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की पदवी भी दी थी।
सन 1954 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से जुड़े तथ्यों को विस्तार से आप तक ले कर आ रहें हैं उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से कुमार मंगलम चिरगांव में स्कूल के बच्चो ने धूम धाम और बैंड बाजा के साथ रैली निकाल कर चिरगांव गल्ला मंडी की पास स्थित स्मारक पर जा कर फूल मालाओं से सम्मान किया और वहा से सीधे राष्ट्र कवि मैथली शरण गुप्त जी के घर जा कर बच्चो ने प्रतिमा पर फूल माला चड़ाई इसमें उपस्थित परिवार के सभी लोग ने बच्चो व अध्यापकों का घर पर सम्मान किया।
मध्य प्रदेश के संस्कृति राज्य मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा द्वारा घोषणा किए जाने के बाद प्रदेश में 03 अगस्त को हर वर्ष ‘कवि दिवस’ के रूप में मनाया जाता है
ताकि युवा पीढ़ी भारतीय साहित्य के स्वर्णिम इतिहास से भली भांति परिचित हो सके।
मैथिलीशरण गुप्त जितने बड़े कवि थे, उतने ही बड़े स्वतंत्रता सेनानी भी रहे।
एक ओर आप राष्ट्रीय भावनाओं से सराबोर काव्य-रचनाओं द्वारा स्वाधीनता आंदोलन की अलख जगा रहे थे ।
वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ मिलकर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय सहभागिता भी कर रहे थे।
अप्रैल, 1941 में जब गांधी जी ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध व्यक्तिगत सत्याग्रह किया तो आप भी पीछे नहीं रहे।
अंग्रेजी हुकूमत ने आपको बंदी बनाकर जेल में बंद कर दिया। पहले झांसी, बाद में आपको आगरा जेल भेजा गया। सात महीने की सजा के बाद आपको जेल से छोड़ा गया।
देशभक्ति का भाव जगाने वाले गुप्त जी कभी किसी प्रतिबंध से विचलित नहीं हुए। वह अपनी रचनाओं से निरंतर राष्ट्र-निर्माण के साथ-साथ चरित्र-निर्माण भी करते रहे।
भारत माता का मंदिर यह” कविता के माध्यम से भी मैथिली शरण गुप्त हमको भारतीयता के संस्कार प्रदान कर एक श्रेष्ठ इंसान बनने की प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं। एक बानगी देखें:-
भारत माता का मंदिर यह
समता का संवाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ
सब तीर्थों का एक तीर्थ यह
हृदय पवित्र बना लें हम
आओ! यहाँ अजातशत्रु बन
सबको मित्र बना लें हम
रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने
मन के चित्र बना लें हम
सौ-सौ आदर्शों को लेकर
एक चरित्र बना लें हम..
स्त्री-करुणा से हुए द्रवित
“अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी
आँचल में है दूध और आँखों में पानी..”
इन पंक्तियों द्वारा नारी-जीवन की दर्द भरी तस्वीर खींचने वाले गुप्त जी वियोगिनी नारियों की करुणा से इतने द्रवित हुए कि उन्होंने साकेत, यशोधरा और विष्णुप्रिया जैसे महान काव्य-ग्रंथों की रचना कर डाली।
आए दिन अखबारों में जब प्रेम या परीक्षा में असफल युवाओं के साथ-साथ अपने अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर चुके विशिष्ट व्यक्तियों के आत्महत्या करने की खबर पढ़ता हूँ
तब यही ख़्याल आता है कि काश! आत्मघाती क़दम उठाने वाले इन लोगों ने गुप्त जी का यह गीत पढ़ा होता..
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रहकर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को
सँभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर हैं अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को
प्रभु ने तुमको कर दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्त करो उनको न अहो
फ़िर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को..





