जालौन में बारिश और जर्जर कच्चे मकानों ने बढ़ाई गरीब परिवारों की मुश्किलें
■ एक बेवा महिला का घर गिरा, मजदूर परिवार पन्नी के नीचे रहने को मजबूर — प्रशासन से मदद की गुहार
जालौन। जिले में गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए जर्जर कच्चे मकान बड़ी मुसीबत बनते जा रहे हैं। उदोतपुरा गांव में एक बेवा महिला का कच्चा मकान अचानक गिरने से उसकी गृहस्थी का सामान मलबे में दबकर बर्बाद हो गया। वहीं, जालौन नगर के तोपखाना मोहल्ले में एक मजदूर का मकान गिरने के बाद पूरा परिवार पन्नी के नीचे रहने को मजबूर है। दोनों परिवारों ने प्रशासन से आर्थिक सहायता और आवास उपलब्ध कराने की गुहार लगाई है।
उदोतपुरा में बेवा महिला का मकान गिरा
उदोतपुरा निवासी अशोक कुमारी पत्नी स्वर्गीय श्रीपाल का कच्चा मकान अचानक गिर गया। बताया जा रहा है कि महिला भूमिहीन और बेहद आर्थिक रूप से कमजोर है। मकान गिरने से घर में रखा गृहस्थी का सामान मलबे में दबकर खराब हो गया। अब महिला के सामने रहने के साथ-साथ रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने का भी संकट खड़ा हो गया है।
पीड़िता का कहना है कि उसके पास न तो जमीन है और न ही मकान की मरम्मत या दोबारा निर्माण कराने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन। महिला ने प्रशासन से आर्थिक सहायता, आवास और सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाए जाने की मांग की है।
पन्नी के नीचे रहने को मजबूर मजदूर परिवार
इसी तरह जालौन नगर के तोपखाना मोहल्ले में अम्बेडकर स्कूल के पीछे रहने वाले आकाश पुत्र बालकिशन का कच्चा मकान भी गिर गया। मकान गिरने के बाद परिवार के पास सुरक्षित रहने के लिए कोई पक्का ठिकाना नहीं बचा। मजबूरी में परिवार पन्नी लगाकर रहने को विवश है।
मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करने वाले आकाश का कहना है कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह अपने स्तर से मकान की मरम्मत या पुनर्निर्माण कराने में सक्षम नहीं है। परिवार ने प्रशासन से तत्काल आर्थिक मदद और प्रधानमंत्री आवास योजना सहित पात्र सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की मांग की है।
प्रशासन से संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई की उम्मीद
दोनों मामलों में गरीब परिवारों की स्थिति ने सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े किए हैं। जरूरत है कि संबंधित अधिकारी मौके का स्थलीय निरीक्षण कर पात्रता की जांच करें और नियमानुसार राहत, आवास अथवा अन्य सरकारी सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में कार्रवाई करें।
अब सवाल यह है कि इन बेबस परिवारों की आवाज जिम्मेदार अधिकारियों तक कब पहुंचेगी और इन्हें सिर पर सुरक्षित छत कब मिलेगी?





