रेपो रेट बढ़ने से महंगे हो सकते हैं होम और कार लोन, आम आदमी के बजट पर पड़ेगा असर
■ त्योहारी सीजन में कर्ज लेने वालों की बढ़ सकती है परेशानी, EMI बढ़ने की आशंका से घरेलू बजट पर दबाव
नई दिल्ली। महंगाई के बीच बैंक से कर्ज लेकर घर, कार या कारोबार शुरू करने की योजना बना रहे लोगों के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी चिंता का कारण बन सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 प्रतिशत किए जाने के फैसले का असर बैंकिंग व्यवस्था से लेकर आम उपभोक्ताओं की जेब तक दिखाई दे सकता है।
त्योहारी सीजन में बड़ी खरीदारी की तैयारी कर रहे लोगों के सामने अब यह सवाल खड़ा हो सकता है कि वे अपनी जरूरतों के लिए कर्ज लें या बढ़ती लागत को देखते हुए अपनी योजनाओं को कुछ समय के लिए टाल दें।
होम लोन से लेकर कार लोन तक पर पड़ सकता है असर
रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को कर्ज देता है। इसमें बदलाव होने पर बैंकों की उधारी लागत प्रभावित हो सकती है। इसके बाद बैंक अपनी नीतियों और कर्ज की शर्तों के अनुसार ग्राहकों के लिए ब्याज दरों में बदलाव कर सकते हैं।
यदि बैंक ब्याज दरें बढ़ाते हैं, तो नए कर्जदारों को पहले की तुलना में अधिक ब्याज चुकाना पड़ सकता है। वहीं, कुछ मौजूदा कर्जदारों की मासिक किस्त यानी EMI बढ़ सकती है या उनके कर्ज की अवधि लंबी हो सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर संबंधित बैंक, कर्ज के प्रकार और ब्याज दर की शर्तों पर निर्भर करेगा।
त्योहारों में खरीदारी की योजनाओं पर असर
त्योहारों के दौरान बड़ी संख्या में लोग मकान खरीदने, नया वाहन लेने और कारोबार बढ़ाने के लिए बैंक से ऋण लेते हैं। ऐसे समय में ब्याज दरों में बढ़ोतरी होने से खरीदारी की लागत बढ़ सकती है।
आम परिवारों को अपनी आय और खर्च के बीच संतुलन बनाने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ सकती है। पहले से ही महंगाई का सामना कर रहे परिवारों के लिए EMI में संभावित बढ़ोतरी घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
महंगाई पर नियंत्रण की कोशिश, लेकिन विकास की चुनौती
रेपो रेट बढ़ाने के पीछे महंगाई को नियंत्रित करने का उद्देश्य हो सकता है। जब कर्ज महंगा होता है, तो लोग और कंपनियां उधार लेकर खर्च करने या निवेश करने से पहले अधिक सोचती हैं। इससे बाजार में मांग की रफ्तार धीमी हो सकती है और कीमतों में तेजी पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, महंगाई का कारण हमेशा बढ़ती मांग ही नहीं होता। ईंधन, कच्चे माल, खाद्य पदार्थों और परिवहन की लागत बढ़ने से भी वस्तुओं की कीमतों में इजाफा हो सकता है। ऐसी स्थिति में केवल ब्याज दर बढ़ाना महंगाई पर नियंत्रण पाने के लिए पर्याप्त नहीं होता।
आम आदमी के सामने दोहरी चुनौती
ब्याज दरों में बढ़ोतरी से एक ओर बचत करने वालों को जमा राशि पर बेहतर ब्याज मिलने की संभावना बन सकती है, वहीं दूसरी ओर कर्ज लेने वालों की लागत बढ़ सकती है। हालांकि, बचत पर मिलने वाला वास्तविक लाभ बैंकों की नीतियों पर निर्भर करेगा।
रिजर्व बैंक के सामने भी चुनौती यही है कि महंगाई को नियंत्रित करने के साथ आर्थिक गतिविधियों, निवेश और रोजगार की रफ्तार को बनाए रखा जाए।
कर्ज लेने से पहले इन बातों पर दें ध्यान
विशेषज्ञों की सामान्य वित्तीय सलाह के अनुसार, कर्ज लेने से पहले उसकी ब्याज दर, EMI, कुल ब्याज लागत और भुगतान की अवधि का आकलन करना जरूरी है। मौजूदा कर्जदारों को भी अपने बैंक से ब्याज दर में बदलाव और EMI पर पड़ने वाले संभावित असर की जानकारी लेनी चाहिए।
कुल मिलाकर, ब्याज दरों में बढ़ोतरी का असर केवल बैंकिंग क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका संबंध आम आदमी की खरीदारी, बचत और भविष्य की वित्तीय योजनाओं से भी होता है। ऐसे में कर्ज लेने का फैसला जल्दबाजी में करने के बजाय अपनी आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखकर करना जरूरी है।






