न सिग्नल की परवाह, न समय की पाबंदी… 124 साल से इंसानियत के भरोसे चल रही बुंदेलखंड की ये ट्रेन

जालौन। देश जहां बुलेट ट्रेन और हाई-स्पीड रेल नेटवर्क की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में आज भी एक ऐसी ट्रेन चल रही है, जिसके नियम न तकनीक तय करती है और न ही घड़ी की सुइयाँ। यह ट्रेन यात्रियों की जरूरत देखकर खुद रुक जाती है। जालौन जिले की एट-कोंच शटल ट्रेन आज भी इंसानियत और भरोसे के सहारे पटरियों पर दौड़ रही है।
स्थानीय लोग इसे प्यार से ‘अददा’ कहते हैं। यह नाम ही इसके स्वभाव को बयान कर देता है—ठहराव, अपनापन और सहजता।
1902 से आज तक नहीं बदला स्वभाव
एट जंक्शन से कोंच के बीच महज 13 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली यह ट्रेन अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में, साल 1902 में शुरू की गई थी। हैरानी की बात यह है कि 124 साल बीत जाने के बाद भी इसका ढांचा और अंदाज़ लगभग वैसा ही है। तब भी यह तीन डिब्बों के साथ चलती थी और आज भी वही पहचान बनाए हुए है।
इस ट्रेन में न अत्याधुनिक सिग्नल सिस्टम है और न ही तेज़ रफ्तार की होड़। यहां सफर को मशीन नहीं, इंसान तय करता है।
हाथ हिलाओ और ट्रेन रुक जाए
आमतौर पर चलती ट्रेन को रोकना कानूनन अपराध माना जाता है, लेकिन एट-कोंच शटल के अपने ही अलिखित नियम हैं। अगर कोई यात्री प्लेटफॉर्म से थोड़ी दूरी पर रह जाता है और दौड़ता हुआ आता दिख जाए, तो गार्ड लोको पायलट को इशारा कर देता है। ट्रेन की गति धीमी कर दी जाती है और यात्री आराम से सवार हो जाता है।
पटरी के किनारे बसे गांवों के लोगों के लिए यह ट्रेन किसी लोकल बस जैसी है—जहां हाथ का इशारा ही टिकट काउंटर और ब्रेक दोनों का काम कर देता है।
धीमी रफ्तार, मजबूत रिश्ता
करीब 30 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली यह ट्रेन 13 किलोमीटर का सफर तय करने में लगभग 40 मिनट लेती है। लेकिन इस धीमेपन में ही इसका आकर्षण छिपा है। किसान, छात्र, दुकानदार और बुजुर्ग—सभी के लिए यह ट्रेन रोजमर्रा की ज़िंदगी का अहम हिस्सा है।
एट जंक्शन झांसी-कानपुर रेलमार्ग पर स्थित होने के कारण बड़े शहरों से जुड़ने का यही सबसे भरोसेमंद साधन है। कोंच और आसपास के इलाकों के लिए ‘अददा’ किसी लाइफलाइन से कम नहीं।
रफ्तार के दौर में ठहराव की मिसाल
जहां आधुनिक रेलवे समय, तकनीक और गति की बात करता है, वहीं यह शटल बताती है कि सफर सिर्फ मंज़िल तक पहुंचने का नाम नहीं, बल्कि साथ निभाने की प्रक्रिया भी है। इसके चालक और गार्ड यात्रियों को महज़ यात्री नहीं, अपने जान-पहचान वाले मानते हैं।
इसी अपनत्व की वजह से यह ट्रेन आज भी बुंदेलखंड की पहचान बनी हुई है।
बुंदेलखंड का चलता-फिरता गौरव
बुलेट ट्रेन के सपनों के बीच एट-कोंच शटल यह याद दिलाती है कि विकास का मतलब सिर्फ तेज़ होना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना भी है। पुरानी सादगी, मानवीय संवेदना और स्थानीय जरूरतों के साथ चलती यह ट्रेन आज भी पटरियों पर नहीं, लोगों के दिलों में दौड़ रही है।

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