पार्ट-2
सत्य तत्त (सार) वेत्ताओं के दृष्टिदर्शन सोचनीय विचारनीय प्रश्न ? “ईश्वर अंश जीव अविनाशी ” ( श्री रामचरित मानस ) जब ईश्वर का अंश है जीव- प्राणी- मानव (नर नारी , स्त्री पुरुष ) तो फिर ? छोटा या बड़ा , ऊंच या नीच भेद कैसा । पारस्परिक घृणा कैसी ,दूरी कैसी और अलगाव कैसा । सोचो ?
“ममे वांशे जीव लोके जीवभूत : सनातन : । ” ( श्रीमद्भगवद् गीता ) सृष्टि के समग्र जीव प्राणी मानव (नरनारी , स्त्री पुरुष) हमारे ही अंशी हमारे ही वंशज | जब सभी परमात्मा के अंशी हैं वंशज हैं फिर पारस्परिक अन्याय अत्याचार परक दुर्व्यवहार कैसा । “तुम कत ब्राम्हण , हम कत सूद्र । हम कत लोहू तुम कत दूध ॥ ” ( संत कायावीर – कबीर) यदि मानव शरीर की बनावट , जीवन संचालनीय क्रिया प्रक्रियाओं मे , रुपों स्वरूपों में कहीं कोई अन्तर या भेद है । तब तो मनुष्य कई जातियों का हो सकता है। जब कोई भेद नहीं ?तो फिर समान शरीर अंगों , समान जीवन की हर क्रिया कलाप में समानता है तो फिर एक ही मानव स्वरूप में विभिन्नता कैसी व मानव की अलग – अलग जाति कैसी । जो ब्राह्मणी तू ब्राह्मण जाया , आन बाट काहें नहीं आया।। (संत कबीर) । “रविदास जन्म के कारणे होत न कोई नीच । । नीच तो करि डारत है ओछे करम की कीच ॥ ” (संत रविदास )
अवलि अलहि नूर उपाइया कुदरत के सब बंदे ।
एक नूर ते सब जग उपजिया कौन भले कौन मंदे ॥ (गुरु नानक देव)
“धर्म लोगों की सेवा व प्रेम में है तस्वीह या मुसल्लाह में नहीं । “(संत शेखसादी )
पारस्परिक प्रेम ही सर्व धर्म है । अर्थात् परमेश्वर का परम सत्य धर्म है । पारस्परिक प्रेम ही परमात्मा का पूर्ण परम सत्य धर्म है , नियम है, नीति है। (हजरत मूसा)
“आत्मवत् सर्वभूतेषु ” अर्थात् अपने जैसा ही समान सबको जानना , मानना । यह मंत्र ही प्रत्येक व्यक्ति द्वारा आत्मसात् करने पर यह जातीय वर्ण व भेदीय स्वरूप निश्चय ही समाप्त हो सकता है । इस आत्मवत् सर्वभूतेषु मंत्र को यदि भारत का प्रत्येक जनमानस अपने अन्तः करणीय आचरण , चरित्र , जीवन , कार्य व्यवहार में उतार ले । तो यह पारस्परिक विषमता की खाई पट जायेगी एवं जाति घृणात्मक , आघात्मक , स्वरूप समाप्त हो जायेगा । अगर हम सभी इस सत्य को स्वीकार कर लें तो भारत देश एकात्मता का रुप सिद्ध हो जायेगा ।
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”


