राजस्थान के स्कूलों में अब ‘पढ़ाई के साथ पहरा’ भी, आवारा कुत्तों की जिम्मेदारी शिक्षकों पर
जयपुर। राजस्थान के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक अब केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए मैदान में भी उतरना होगा। शिक्षा विभाग ने एक ऐसा निर्देश जारी किया है, जिसने शिक्षकों की जिम्मेदारियों की सूची में एक नया अध्याय जोड़ दिया है—स्कूल परिसरों से आवारा कुत्तों को दूर रखना।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद विभाग सख्त
देशभर में आवारा कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद अब राजस्थान में इसका असर सीधे स्कूलों तक पहुंच गया है। शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि विद्यार्थियों और स्टाफ की सुरक्षा सर्वोपरि है और किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
स्कूल बने ‘सेफ जोन’
नए निर्देशों के अनुसार हर स्कूल को अपने परिसर और आसपास के इलाकों को संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिन्हित करना होगा।
स्कूल गेट, चारदीवारी और खुले मैदानों पर विशेष निगरानी
आवारा कुत्तों की आवाजाही रोकने के ठोस इंतजाम
नगर निगम, पंचायत, विकास प्राधिकरण और प्रशासन से समन्वय
इन सभी कार्यों की सीधी जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों पर डाली गई है।
हर तीन महीने में होगी जांच
शिक्षा विभाग ने निगरानी व्यवस्था भी तय कर दी है।
मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी और ब्लॉक संदर्भ केंद्र प्रभारी हर तीन महीने में निरीक्षण करेंगे। यदि स्कूल परिसर में आवारा कुत्ते पाए गए या सुरक्षा इंतजाम कमजोर मिले, तो
👉 संस्था प्रधान
👉 संबंधित प्रभारी
के खिलाफ कार्रवाई तय मानी जाएगी।
शिक्षकों की बढ़ती जिम्मेदारियों पर सवाल
शिक्षक संगठनों का कहना है कि पहले ही उन पर
मिड-डे मील / दूध-पोषाहार
किताब वितरण
ऑनलाइन उपस्थिति
निपुण राजस्थान, प्रखर राजस्थान
सर्वे, रिपोर्टिंग और प्रशासनिक कार्य
जैसे करीब 50 गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ है। अब सुरक्षा और समन्वय का दायित्व जुड़ने से शिक्षण कार्य प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
शिक्षा निदेशक का पक्ष
शिक्षा निदेशक ने कहा कि
“सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की पालना अनिवार्य है। विद्यार्थियों और स्टाफ की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। सभी संयुक्त निदेशकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।”
सवाल वही—पढ़ाएंगे कब?
जहां एक ओर सरकार स्कूलों में गुणवत्ता सुधार की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों को लगातार नई जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि
क्या शिक्षक अब शिक्षक से ज्यादा ‘मैनेजर’ बनते जा रहे हैं?





