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आज राजतंत्र में विद्यमान राजनेता एक स्वमेव स्वयं की व अपने वर्ण की सीमा में तन-मन-जीवन सत्य न्यायिक स्वरूप जिसे परमेश्वर सर्वेश्वर का सत्य न्याय का नाम दिया जाता है , कहा जाता है। वह अब उस ईश्वरीय सत्य नीति, नैतिकता की पराकाष्ठा पार कर आज के राजनेता स्वहित , स्वअहम् पोषित निज सुखस्वार्थमयी अन्धता के शिकार होकर , देश के ; राज्य के, प्रजातंत्रीय स्वरूप में अपनी मनोभावीय, अपनी मनोइच्छीय ढंग से राष्ट्र समाज , राज्य समाज प्रणाली पर प्रजातंत्रीय सत्य व्यवस्था ना करके । उसे धता बताकर मात्र उच्च पदों पर संवैधानिक पदों पर आसीन होकर देश की जनता, राज्य की जनता के जीवन कार्य , व्यापार जीवन , अस्मत का कहीं कोई मूल्य न समझते हुए, संविधान की अहमियत न समझते हुए उसे ताक पर रखते हुए भरपूर न्याय के नाम पर जातीयगत वर्चस्व जैसी निचली स्वरूपीय सीमा में आ गये हैं। जो मात्र निज स्व (स्वयं ) मात्र की ही व जो निज सुख स्वार्थ अहंकार पोषित स्वरूपीय सीमा मात्रा के दायरे में है। जबकि भारत देश की आबादी एक अरब पैतालीस करोड़ के लगभग है। जहां हजारों वर्णों स्वरूप में, स्वरूप के व्यक्ति दाम्पत्य जीवन में व माताओं,बहिनों – बेटियों , बालक बालिकाएं युवकों के रूप में निवास कर रहे हैं। जो  विभिन्न – विभिन्न समुदायों के रूप में विभिन्न – विभिन्न वर्णों के रूपमें हैं जरूर, परन्तु अपने गौरव गरिमामयी भारत राष्ट्र के लिए तन मन धन से सम्पूर्ण तया भारत मात्र स्वरूप में समर्पित हैं व अपने भारत देश लिए नतमस्तक हैं। और सभी एक सौ पैतालिस करोड़ आदमी, राजतंत्र में आसीन पद प्रतिष्ठावान राष्ट्र सेंवकों से , अपने आत्म कल्याण जीवन के हर विषय पर, सर्वकल्याण की आशा अपेक्षा करते, रखते हुए अपनी आशाओं की पूर्ति सर्व सद् भाव , सर्वसद् प्रेम , सर्वसद् शान्ति के चलते रहते हुए, राजतंत्र में विद्यमान राष्ट्र सेवकों से अपेक्षा की , सत्य न्याय की , सत्य रोजी – रोटी की व्यवस्था की, सत्यजीवन कार्यव्यापार की , सत्य सद्‌भावीय , सत्य सद् प्रेम मयी जीवन संचालन की गुहार करते हैं, गुहार लगाते हैं। ऐसे में राजतंत्रीय व्यवस्था जो स्वा सुख स्वार्थ मात्र सिद्ध करने में डूबा, अन्धा मात्र अपने स्व में, स्वयंकी सीमा में अपने तन , मन , बुद्धि विवेक की दृष्टि लगाये , गड़ाए अपनी मनो इच्छित मन मानी स्वरूपीय नीतियों को प्रश्रय देकर , सत्व गुणीय , सत्विकीय प्रकृतीय को भूलता हुआ, भुलाता हुआ अपनी मन मानी , मनोइच्छाओं को ढोने में लगा है। ऐसे में राष्ट्र के जनमानस के साथ न्याय का स्वरूप क्या होगा । स्वयं ही देशवासी , अधिकारी , कर्मचारी समझ सकते हैं। आज देश में हर जगह जीवन का कोई विषय हो ? सत्य न्यायस्वरूप नहीं प्राप्त कर रहा है। आज राष्ट्र का राजन्त्र और प्रजातंत्र सब में जीवन की आपाधापीय, उथल-पुथल मची पड़ी है। आज राष्ट्र में , राज्य में आत्म हत्यायें , मर्डर , चोरी ,लूट-खसोट , बलात्कार रूप में त्राहि – त्राहि सम्पूर्ण देश में राष्ट्र में व्याप्त है। जो सर्वत्र सभी को दृष्टिगोचर है व हो रहा है। मेरे आत्मिक भाइयों , माताओ, बहिनों बेटियों होश में आओ । स्वयं से लगाकर अपना घर परिवार , समाज , देश सबकी गरिमा गौरव पहिचानों और एक सौ पैतालीस करोड़ अपने देशवासियों, आत्मिक भाइयों का आत्मवत् व्यवहार को। तभी ईश्वरीय परम सत्ताई , सर्वोच्चसत्ताई सत्य व्यवस्था लौटेगी और हम सभी पूर्ण परम सत्य आत्म आनंद की व्यवस्था में लौटेंगे व लौट पाएंगे । इसलिये मानव मानव के प्रति आत्मीयता लाओ । सभी को पारस्परिक रूप से आत्मवत् जानो व मानो । विश्व बंधुत्व , श्रृष्टि बंधुत्व तभी बनेगा और सुख , शान्ति आनन्द की बयार बहेगी । अतः “आत्मवत् सर्वभूतेषु ” मंत्र का आत्मसात करो और पारस्परिक व्यवहारिकता में धारण करो । मानन करो, पालन करो , सर्वत्र सकल सृष्टि की मानव  ( नर-नारी,स्त्री-षुरुष) जीवन की त्राहि-त्राहि तभी खत्म होगी । “जागो रे जिन जागना अब जागन की बार ।

“तब का जागे मानवा जब सम्पूर्णतया विनष्ट हो गया स्वयं से लगाकर सम्पूर्ण संसार ॥”

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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