शराब और मौतें: भारत को विकास नहीं, नशाबंदी चाहिए
शराब: एक आदमी नहीं, पूरी पीढ़ी को खा जाती है
■ नशा मुक्त भारत ही आत्मनिर्भर भारत है
रिपोर्ट : डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”
■ भारत में गरीबी, घरेलू हिंसा, पारिवारिक विघटन और आत्महत्याओं के पीछे यदि किसी एक कारण को सबसे ऊपर रखा जाए, तो वह है—शराब।
वरिष्ठ चिंतक डॉ. बनवारीलाल पीपर ‘शास्त्री’ का स्पष्ट मत है कि यदि व्यक्ति नशामुक्त होकर परिश्रमशील जीवन अपनाए, तो उसे न सरकार से सहायता की आवश्यकता पड़ेगी और न ही किसी अन्य सहयोग की अपेक्षा रहेगी।
नशा नहीं, मेहनत जीवन का आधार
डॉ. पीपर के अनुसार नशा व्यक्ति को कर्महीन बनाता है। शराब केवल शरीर को नहीं, बल्कि बुद्धि, विवेक, आत्मसम्मान और भविष्य को भी नष्ट कर देती है। जो व्यक्ति नशे का आदी नहीं होता, वह अपनी श्रमशीलता के बल पर अपने परिवार का भरण-पोषण स्वयं कर सकता है, बच्चों को शिक्षित कर सकता है और सम्मानजनक जीवन जी सकता है।
शराब और टूटता परिवार
शराब का दुष्प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।
यह—
माता-पिता का सम्मान समाप्त करता है
पत्नी के प्रति हिंसा को जन्म देता है
बच्चों के भविष्य को अंधकार में ढकेल देता है
पत्नी हत्या, संतान हत्या और आत्महत्या जैसी घटनाओं का कारण बनता है
डॉ. पीपर का कहना है कि जिस घर में शराब पीने वाला व्यक्ति होता है, वह घर स्थायी रूप से अशांति और भय का केंद्र बन जाता है।
विकास बनाम विनाश
शराब व्यक्ति की आयु घटाती है, स्वास्थ्य नष्ट करती है और परिवार को ऐसी पीड़ा देती है, जिसका प्रभाव एक-दो पीढ़ियों तक समाप्त नहीं होता। यह बुरा व्यसन केवल परिवार ही नहीं तोड़ता, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास को भी रोक देता है।
उनके शब्दों में—
“शराब को आदमी नहीं पीता, बल्कि आदमी को शराब पी जाती है।”
सरकार से सीधा आग्रह
डॉ. बनवारीलाल पीपर ‘शास्त्री’ का मानना है कि सरकारें यदि वास्तव में समाज की भलाई चाहती हैं, तो तमाम योजनाओं और सुविधाओं से पहले सम्पूर्ण भारत में शराबबंदी लागू करनी चाहिए।
उनका तर्क है कि नशामुक्त समाज में रहने वाला मेहनती नागरिक सरकार पर बोझ नहीं बनेगा, बल्कि स्वयं आत्मनिर्भर होकर अपने परिवार और समाज का निर्माण करेगा।
आत्मनिर्भर भारत का मूल मंत्र
यदि भारत का प्रत्येक परिवार इस जीवन-सूत्र को आत्मसात कर ले—
“जेते पांव पसारिये, जेती चादर होय।”
तो—
न किसी को कर्ज़ की आवश्यकता पड़ेगी
न किसी को सरकारी सहायता की भीख
न ही रिश्तों या सत्ता के आगे हाथ फैलाने की मजबूरी
यही वास्तविक आत्मनिर्भर भारत होगा—जहाँ हर परिवार अपने श्रम और संयम से सशक्त होगा।
निष्कर्ष
शराबबंदी केवल एक सामाजिक निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य शर्त है।
जिस दिन भारत नशामुक्त होगा, उस दिन—
घरों में शांति होगी
समाज में अपराध घटेंगे
और सरकार पर निर्भरता अपने आप समाप्त हो जाएगी
डॉ. पीपर के अनुसार अब समय आ गया है कि शासन सत्ता इस सामाजिक विनाश के मूल कारण को समाप्त करने का साहसिक निर्णय ले।






