व्यक्ति (बालक – बालिकाएं , नर- नारी , स्त्री-पुरुषों ) को अपने घर परिवार, माता-पिता के वर्तमान परिवेश, वर्तमान परिस्थितियों का सत्य आकलन करते / रखते हुये अपना मनोभाव, अपनी मनोसोच , अपनी मनो लौ लगन , प्रबल जिज्ञासा व अपना सम्पूर्ण तन, मन उन कार्यों में अपने पूर्ण परम सत्य समर्पण के साथ चाहे शिक्षा ग्रहण स्वरूप हो या जीवन कार्य व्यापार, करने में लगाना चाहिए । जो वर्तमान में परमसत्य अतिआवश्यक है । व्यक्ति का अभीष्ट उपरोक्त सत्य का पालन करने से ही सिद्ध होता है।
– डा० बनवारीलाल पीपर “शास्त्री”




