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कौन हैं राकेश अग्रवाल? आतंक के खिलाफ लड़ाई की कमान संभालने वाले NIA के नए ‘साइलेंट स्ट्रैटजिस्ट’

नई दिल्ली। राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए हिमाचल प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अग्रवाल को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) का नया महानिदेशक नियुक्त किया है। यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब आतंकी नेटवर्क, अंतरराष्ट्रीय साजिशें और सीमापार अपराध भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं।
कार्यवाहक से फुल कमान तक
महाराष्ट्र कैडर के आईपीएस सदानंद दाते के महाराष्ट्र डीजीपी बनने के बाद से राकेश अग्रवाल ही एनआईए चीफ की अतिरिक्त जिम्मेदारी संभाल रहे थे। अब केंद्र सरकार ने उनके अनुभव और कार्यशैली पर भरोसा जताते हुए उन्हें पूरी कमान सौंप दी है। वे 31 अगस्त 2028 तक या अगले आदेश तक इस पद पर बने रहेंगे।
हरियाणा से दिल्ली तक का सफर
5 अगस्त 1968 को जन्मे राकेश अग्रवाल मूल रूप से हरियाणा के रहने वाले हैं। वे 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और वर्तमान में हिमाचल प्रदेश कैडर से आते हैं। तीन दशकों के सेवा काल में उन्होंने फील्ड से लेकर पॉलिसी और इन्वेस्टिगेशन तक हर मोर्चे पर काम किया है।
NIA के सातवें चीफ
राकेश अग्रवाल एनआईए के सातवें महानिदेशक बने हैं।
एनआईए के पहले प्रमुख राधा विनोद राजू थे। इसके बाद
वाई.सी. मोदी, कुलदीप सिंह (कार्यवाहक), दिनकर गुप्ता और सदानंद दाते ने एजेंसी की कमान संभाली। दाते के नेतृत्व में पहलगाम हमले की जांच और तहव्वुर राणा को अमेरिका से भारत लाने जैसे अहम मिशन पूरे हुए।
CBI का अनुभव, जांच की गहरी समझ
एनआईए से पहले राकेश अग्रवाल सीबीआई में ज्वाइंट डायरेक्टर के रूप में भी सेवाएं दे चुके हैं। आतंकवाद, संगठित अपराध और संवेदनशील मामलों की जांच का उन्हें लंबा अनुभव है।
पिछले साल जुलाई 2024 में वे एनआईए में एडीजी बने और सितंबर 2024 में स्पेशल डीजी की जिम्मेदारी सौंपी गई।
सम्मान और उपलब्धियां
अपने अब तक के सेवाकाल में राकेश अग्रवाल को उत्कृष्ट सेवा के लिए दो बार मेडल से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने AMIE की पढ़ाई की है और उन्हें एक लो-प्रोफाइल लेकिन मजबूत फैसले लेने वाला अफसर माना जाता है।
आतंक के खिलाफ निर्णायक दौर
एनआईए चीफ का कार्यकाल सामान्यतः दो वर्ष का होता है, लेकिन मौजूदा हालात में राकेश अग्रवाल से एजेंसी को रणनीतिक मजबूती और निर्णायक दिशा देने की उम्मीद की जा रही है।
अब देश की सबसे संवेदनशील जांच एजेंसी की कमान उस अफसर के हाथ में है, जिसने वर्षों तक पर्दे के पीछे रहकर आतंक और अपराध के खिलाफ रणनीति तैयार की।

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