जब सबसे नजदीकीय अपना अंश बेटी और अपने अंश बेटे की भार्या (पुत्र वधु ) अपनी नहीं हो सकती । जो अपना सत्य कर्तव्य दायित्व सत्य स्नेहपूर्ण ईमानदारी से नहीं निभा सकती । तो पड़ोसी , अन्य रिश्तेदार मित्र कलत्र, संसार समाज के लोग क्या अपने हो सकते हैं ? कोई नहीं। फिर सब धोखा ही धोखा है। फिर तो अपने स्वयं से प्रेम करो । अपने स्वयं के जीवन कार्य अकेले ही स्वयं से परिपूर्ण करो अर्थात स्वयं से ही प्रेम करो । यदि पत्नी जीवित हो और सत्य कर्तव्य , दायित्व स्नेहपूर्ण ढंग से निर्वहन करे । तो बस वह साथी सहयोगिनी ही मात्र पूर्ण व पर्याप्त है। बाकी सबका आश्रय और अपेक्षा छोड़ो । यही सत्य सुख ,शान्ति ‘ आनन्द का पूर्ण व पर्याप्त अकेले हेतु सुख शान्ति दायक रहेगा ।
यारो यारो यारो
यह जो दुनिया है मैंने इसे देखा है
मैंने इसे समझा है
सब धोखा ही धोखा है
जियो राम यारो यह जो दुनिया है
मैंने इसे देखा है
मैंने इसे समझा है
सब धोखा ही धोखा है
जियो राम यहाँ मतलब के सब बन्दे है
यहाँ चोरी के सब धंधे है
कोई फीता काटे हाथों से
कोई लूटे मीठी बातों से
बस फ़र्क है, इतना चोरो में
कोई बड़ा कोई छोटा है
जियो राम यारो यह जो दुनिया है
मैंने इसे देखा है
मैंने इसे समझा है
सब धोखा ही धोखा है
जियो राम झुकते को सभी झुकाते है
गिरते को सभी गिराते है
जो नहले पर दहला मारे
उसको आदाब बजाते है
कुछ झूठ कहा हो भैया
तो सर मेरा तेरा जूता है
जियो राम यारो
यह जो दुनिया है मैंने इसे देखा है
मैंने इसे समझा है
सब धोखा ही धोखा है
जियो राम यारो
यह जो दुनिया है
मैंने इसे देखा है
मैंने इसे समझा है , मैने इसे जाना है
सब धोखा ही धोखा है
जियो राम जियो राम जियो राम ॥
“अपने जो दें धोखा , तो गैरों से शिकायत क्या ।
अपने जब अपना कर्तव्य दायित्व भूल गये , फिर दूसरों से आशा और अपेक्षा क्या ।
अपने ही को पहिचानों और अपने स्वयं को ही अपना जानो ।
बस इस तरह जीवन बना लो , इससे अच्छा क्या ॥
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री “


