धार्मिक मतभेद समाप्त कर पारस्परिक प्रेम बढ़ाने का अनूठा सुझाव: डॉ. बनवारीलाल पीपर ‘शास्त्री’

देश में विभिन्न समुदायों और सम्प्रदायों के बीच बढ़ते धार्मिक मतभेदों को समाप्त करने तथा पारस्परिक प्रेम और सद्भावना को बढ़ावा देने के लिए समाज चिंतक डॉ. बनवारीलाल पीपर “शास्त्री” ने एक अनूठा सुझाव दिया है।
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि देश में ऐसे विशेष स्थान बनाए जाएँ जहाँ एक ही परिसर में मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा का निर्माण किया जाए, ताकि सभी धर्मों के लोग एक साथ आकर अपनी-अपनी आस्था के अनुसार पूजा-अर्चना कर सकें।
डॉ. शास्त्री का कहना है कि यदि भारत की संसद इस प्रस्ताव पर विचार कर इसे लागू करती है, तो इससे विभिन्न समुदायों के बीच आपसी मेल-जोल और भाईचारा बढ़ेगा तथा धार्मिक संघर्षों की संभावनाएँ काफी हद तक कम हो सकती हैं। उनके अनुसार ऐसे धार्मिक परिसर सामाजिक समरसता और एकता के प्रतीक बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि जब विभिन्न धर्मों के लोग एक ही स्थान पर मिलकर अपने-अपने ईश्वर की उपासना करेंगे और बाद में एक-दूसरे से गले मिलकर वापस अपने घरों को लौटेंगे, तो उनके मन में किसी प्रकार का द्वेष या विरोधाभास नहीं रहेगा। इससे देश में सुख, शांति और अमन-चैन का वातावरण मजबूत होगा।
डॉ. शास्त्री ने अपने विचारों के समर्थन में कई महान संतों और महापुरुषों के कथनों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हजरत मूसा, हजरत मुहम्मद, गुरु नानक देव, श्रीकृष्ण, तुलसीदास और कबीर जैसे महान संतों ने भी मानवता, प्रेम और पारस्परिक सद्भाव को ही सबसे बड़ा धर्म बताया है।
उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देती है, जिसका अर्थ है कि पूरी दुनिया एक परिवार है। यदि मानव समाज इस सिद्धांत को अपनाए तो न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में शांति और भाईचारे का वातावरण स्थापित हो सकता है।
डॉ. बनवारीलाल पीपर “शास्त्री” ने देश के नीति-निर्माताओं, शासन-प्रशासन और समाज के सभी वर्गों से इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की अपील की है। उनका मानना है कि पारस्परिक प्रेम और आत्मीयता ही समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाने का सबसे बड़ा आधार है।

इस विषय पर अवतारीय महामानव, महापुरुषों, सत्य तत्तीय उनके द्वारा अनुभूत हुए सत्य विचार – प्रेम के सिवा तू किसी परमात्मा को न मान – हजरत मूसा

सम्पूर्ण मानवता एक परिवार है , अल्लाह उसी से प्यार करता है जो उसकी सृजनीय सृष्टि जीव, प्राणी , मानव से प्यार करता है – हजरत मुहम्मद

अल्लाह को खुश करने का नजरिया है पारस्परिक आत्मीयता व आत्मवत् प्रेम ही है – शेख सादी

ईश्वर अंश जीव अविनाशी ( प्रत्येक जीव, प्राणी , मानव परमेश्वर का ही अंश है। इसी से ही सभी से आत्मवत् प्रेम करो – गोस्वामी तुलसीदास

” ममेवांशे जीवलोके सर्वभूते सनातना ” ( सभी जीव , प्राणी और मानव हमारे ही अंशी और वंशज हैं । इसलिए सभी पारस्परिक प्रेम के आत्मवतीय प्रेम करने के व पारस्परिक प्रेम रखने के अधिकारी हैं।) – महायोगयोगेश्वर श्री कृष्ण जी महाराज

अवलि अलहि नूर उपाइया कुदरत के सब बंदे एक नूर से सब जग उपजया कौन भले कौन मन्दे ( जब परमेश्वर ने मानवीय जगत की एक संरचना की है तो फिर क्यों न हम सब एक हो जायें और एक होकर रहें । )- गुरुनानक देव

” प्रेम न बाढ़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय । राजा प्रजा जेह रुचे शीश देह ले जाये ” ( श्री कबीर जी महाराज कहते हैं कि सबसे शीर्ष  मानव के  मस्तिष्कीय भाग पर अहंकार रूपीय शैतान निवास करता है जो सर्व संघर्षीय रूप जगद् मानवों के मन मस्तिष्क में  उद्वेलित करता है। यही पारस्परिक विनाश की जड़ है। बस प्रत्येक मानव इसे उखाड़ करके फेक दे । मानव शरीर बस अपने दिमाग में पल रहे इस अहंकार रूपी वृक्ष को काट करके फेक दे । नेेस्तनाबूत कर दे। बस प्रत्येक मानव मन में प्रेम की  ज्योति जगेगी जो राष्ट्र को सम्पूूर्ण विश्व को प्रेम मयी धारा में बहा लेगी और सर्वमयी अमन चैन और शान्ति की स्थिति बन उठेगी, बन जायेगी। कबीर जी का तत्पर्य यह है संसार में सर्व मानव प्रेममयी शान्ति का मूल आधार है। और प्रत्येक मानव सत्य शान्ति ही चाहता है ।। )

सबसे ऊंची प्रेम सगाई, प्रेम के बस पारथ रथ हाक्यो भूल गये ठकुराई । प्रेम के बस नृप सेवा कीन्ही , आप बने हरि नाई । राजसु यज्ञ युधिष्ठिर कीन्हो ता में जूठ ( जूठन ) उठाई । सबसे ऊंची प्रेम सगाई।

हिन्दू कहे हम बड़े मुसलमान कहे हम एक मूंग दो फाड़ हैं कुड़ ज्यादा कुड़ कम।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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