- क्यों बेतहाशा होकर, अपना सुख चैन गवां कर,क्यों भागों, क्यों दौड़ो ?
रिपोर्ट: डॉ ० बनबारी लाल पीपर “शास्त्री”
focusnews24x7
■■■■■■■■■■■■■■■■■
क्या मांगू कछु थिर ना रहाई।
देखत नैन चला जग जाई।
इक लख पूत सवा लख नाती। ता रावण घर दिया ना बाती।
लंक सी कोट समुद्र सी खाई।
ता रावण की खबर ना पाई।
कहे कबीर अंत की बारी
हाथ झाड़ि ज्यों चले जुआरी।
यह एक परम सत्य तात्विक सत्य वेत्ता का मानव जीवन के संबंध में यह परम सत्य सार युक्त जीवन जीने परम सत्य दर्शन है व यथार्थ सत्यीय वर्णन है।
कि हे मानव काहे को इस नश्व़र शरीर और धन संपत्ति के लोभ लालच में अपने शरीर की दुर्गति बनाकर अनावश्यकीय व्यर्थ की चिंता करते हुये अपने शरीर को जिंदा लाश बना कर जी रहे हो व शरीर को लोभ,लालच, मोह, आसक्ति की ग्रसितता तथा क्षणिक भोगीय सुखों की उपभोग की लालशा कारण शरीर को स्वयं की ही अज्ञान जनित मूर्खता वशीभूत होकर अपनी आयु व अपना जीवन घटाते हुये विभिन्न-विभिन्न बीमारियों को स्वयं अपने कर्म स्वरूप से स्वयं पाले हुये अपना जीवन का नाश मनुष्य द्वारा किया जा रहा अथवा करने में उतारू है अथवा तमाम बीमारियों का रोगी और शिकार है। इसका मुख्य कारण है निश्चिंत ना होना,निश्चिंत ना रहना। 24 घंटा, यह धोखा, वह ठगी , यह धूर्तता वह पाखंडपन,कभी अहंकारीय दृष्टिकोण से यह झगड़ा, यह धूर्तता, यह पागलपन, वह हत्या वह मर्डर वह अहंकारी वशीभूतता की क्रिया।वह क्रोध वह झगड़ा ऐसी राजसी और तामसी प्रकृति अथवा प्रवृत्ति वाले ही तमाम-तमाम विभिन्न-विभिन्न रोगों के घटनाओं के शिकार हो जाते हैं/ होते हैं l तनाव टेन्शन,ब्लड प्रेशर लो या हाई होना, अटैक, हृदय गति रुकना रुक जाना व अन्य तमाम शारीरिक मानसिक रोगों के शिकार होना रहना तथा अपना परम सत्य आत्म नियंत्रण न करना न रखना । सत्य सात्विकीय गुणधर्म कर्म से नाता न रखना ना जोड़ना तथा जल्दी धनवान बनने की लोभ लालशा पाल के अन्याय जनित अत्याचारीय कर्म अपनी काया से करना । कहीं किसी भी अपने ही आत्मीय भाई का गला घोंटने उसके साथ धोखा दगा,छल छद्म झूठ पाखंड से राजसी और तामसी प्रकृति के वशीभूत होकर परम सत्य यथार्थ ईश्वरीय दिशा न्याय नीति युक्त नियम विधानीय दिशा धारा से भटक जाना और सुकर्म छोड़ कुकर्म करने की ओर बढ़ जाना। इन्हीं का ही परिणाम है कि व्यक्ति की आयु पूरी न करते हुये अल्पायु में विभिन्न-विभिन्न रूपीय स्वरूपी घटनाओं दुर्बलताओं का शिकार होकर स्वयं बर्बाद रहना व अपना परिवार बर्बादी की कगार पर छोड़ देना , छोड़ जाना और अल्प आयु में मर जाना है । इसका परम सत्य उपाय है निरोग रहने का रोग बीमारियों से बचने का दुख कष्टों से सदैव मुक्त रहते हुये संपूर्ण जीवनीय आधिया व्याधियां से पूर्ण परम सत्य रूप में सत्य सात्विकीय प्रवृत्तियों को धारण करना आत्म संयमित जीवन बनाना, अपने ऊपर परम सत्य आत्म नियंत्रण रखना चंचल बहु विषयी धाराओं में सही-गलत का अथवा सत्य असत्य विचार न करने वाले चहुं ओरिय दिशाओं में दौड़ने वाले अपने मन का भाव देखना पहचानना गलत से । अपनी अंतः करणीय आत्मीय आवाज को सुनते हुये मानते हुये मन की धारा में ना बहते हुये अपने को आत्मा (आत्मेश्व़री) के निर्देशनीय सत्य को ईश्वरीय परम सत्य का मापदंड मानते हुये परम सत्य कर्तव्यीय जीवन जहां जिसके प्रति माता-पिता पत्नी संतान भाई बंधु व समग्र सृष्टि पटल के आत्मीयजन व समाज संसार को “वसुधैव कुटुंबकम्” मानते हुये सत्याचार धारण करते हुये बगैर कहीं किसी लोभ लालच की लालसा तन मन हृदय मस्तिष्क दिल दिमाग भाव विचार में रखते हुये जीवन संचालन करना जीवन का समस्त कार्य व्यापार पूर्ण ईमानदारी से करना और सभी के साथ आत्मवत् प्रेमवत व्यवहार करना । बस यही ईश्वरीय प्रिय नियम नीति रीति विधान का जीने का रहने का परम सत्य है । इतना सत्य सर्व हितीय भाव धारण करने वाला ही ईश्वरीय परम सत्य आचारीय है यही सद् आचरण जो कोई धारण करता है वह ही पूर्णतया निश्चिंत रहता हुआ पूर्ण निरोग आरोग्य वान रहता हुआ पूर्ण आयु पाता है और ऐसा ही व्यक्ति अपने को अपने परिवार को परम सुख शांति आनंदमयी रखता बनाता हुआ स्वयं व सपरिवार अगर कहीं स्वर्ग की जो कल्पना बताई जाती सर्व सुख पाने की वह व्यक्ति, व्यक्ति के परिवार व संसार तथा समाज में इसी सृष्टि धरा पर व्यक्तियों के जीवन में परिलक्षित होती। बस यही सत्कर्मो, सात्विकीय गुण स्वभाव धारण की महत्ता है जो व्यक्ति को बगैर औषधि के पूर्ण आयु व निरोग जीवन प्रदान करती है । इस सत्य को जानो मानो व पालन करो। डॉक्टर/ वैद्यों के लुटने से, लूटने से या धन लुटाने से पूर्णतया बचे रहोगे बस उपरोक्त सत्य मंत्र सत्य ज्ञान शब्द स्वरूपीय को धारण कर लेना ही हजारों रोगों से दूर रखने बचाने की अमूल्य अमृत तुल्य औषधि है बिना पैसे की , बिना भटकाव की।
– डॉ ० बनबारी लाल पीपर “शास्त्री”





