मन का चंचलीय बहुविषयों की ओर जाने वाला गुण स्वभाव ही तो हमें अथवा सबको नचा रहा।
रिपोर्ट : डा ० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”
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- सद्गुणमयी पद्धति, स्वरूप को आत्मसात करो तथा तन मन जीवन को परम आनंदमयी परम आरोग्यमयी स्वरूप स्वयं से दे।
मन का चंचलीय बहुविषयों की ओर जाने वाला गुण स्वभाव ही तो हमें अथवा सबको नचा रहा,दौड़ा रहा, हमारी शारीरेन्द्रियों को असीमित करके परम सत्य जीवन धारा को असंतुलित बना रहा।
जिसके कारण ही तन जीवन को रोग बीमारियों के जाल में फंसा रहा।
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लो, हाई ब्लड प्रेशर, डाईबिटीज, दिल की घबराहट, हार्ट अटैक, शारीरिक मानसिक जीवन संचालन विकृति तन में मन में पैदा कर रहा व बढ़ा रहा।
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इसी कारण मानव जीवन का परम सत्य आनंद जीवन से खोता जा रहा और शरीर रोगी होकर करके हम सभी की जीवन आयु कम करते हुये जीवन को खाता जा रहा।
व्यक्ति धन सम्पत्ति वैभव की कमाने जुटाने, बढ़ाने के लोभ लालच में फंसकर
- यथार्थ सत्य आवश्यकीय रंग ढंग भूलकर
- स्वयं से स्वयं का जीवन दुखमय कष्टमय, शारीरिक मानसिक पीड़ामय बना रहा।
तन मन की किसी भी इच्छा का पूर्ण होना आवश्यक नहीं है कि वह पूर्ण हो जाये परन्तु तन को दौड़ा रहा मन को विषय वस्तु पर लगा रहा और जीवन को आवश्यकीय अनावश्यकीय इच्छाओं को जो स्वयं से बढ़ाई गयीं ,बनाई गयीं, पाली गयीं उनकी पूर्ति में अपना होश हवाश खोकर हवश आपूर्ति का शिकार होकर अपनी बेचैनी को प्रश्रय दे कर बढ़ा रहा।
मन की इच्छाओं का अंत नहीं है I
इन्हें थामों इन्ही को रोको सिर्फ जीवन संचालन की अति आवश्यकीय रूपों स्वरूपों को परम सत्य कर्म योगीय स्वरूप धारण करके एक सधा, सौम्य, सरल शांत मनोभाव तन में मन में जीवन में लाओ, बनाओ, चलाओ और परम सत्य पूर्ण निरोगी स्वस्थ्य जीवन रखो । बनाओ, जिओ और हर क्षण आनंदमयी उत्सव स्वरूप जीवन कार्य पद्धति अपनाते हुये पूर्ण परम सत्य ईश्वर दायित्वीय ईश्वर कर्म कर्तव्यीय स्वरूप धारण करो और सत्य जीवन जीने का सार जानते हुए व मानते हुए परम सत्य कर्मयोगी रुप में जीवन कार्य पद्धति बनाओ व जिओ |
बस यही आत्मदर्शनीय जीवन जीने का परम सत्य रुप है
यही सरल जीवन जीने की आर्ट है, कला है क्रिया है प्रक्रिया है और परम सत्य पद्धति है ।
इस परम सत्य रुप को पूर्णतया अपनाओ ऐसी सद्गुणमयी पद्धति, स्वरूप को आत्मसात करो तथा तन मन जीवन को परम आनंदमयी परम आरोग्यमयी स्वरूप स्वयं से दे करके सद् आनंदमय निर्विकार निश्छलीय जीवन जियो और सदैव निरोग रहते हुए एक परम सत्य कर्मयोगी जीवन की भूमिका जीवन यात्रा में परिपूर्ण करो ।




