ईश्वरांश आत्मा की दिशा दर्शन से जीवन का सम्पूर्ण संचालन ।

रिपोर्ट: डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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ईश्वरांश आत्मा की दिशा दर्शन से जीवन का सम्पूर्ण संचालन । तन मन और इन्द्रियों की मोहमयी आशक्ति से अपने को सम्पूर्णतया निर्मूल करना व रखना । जीवन के कार्य व्यापार को शरीर -मन – इन्द्रियों की पूर्ति आपूर्ति के जीवन सम्बन्धी जो भी कार्य व्यापार हैं ? योग से लगाकर भोग तक, धनसम्पत्ति कमाने, संग्रह करने तथा ऐश्वर्य व वैभव स्वरूपीय इच्छाओं की पूर्ति आपूर्ति तक उनमें लोभ लालच, लालसा, तृष्णा रूपीय मोही आसक्तियों से अपने को सम्पूर्णतया मुक्त रखना / मुक्त करना / मुक्त रहना एवं इन सभी पूर्ति आपूर्ति के कर्तव्यीय – दायित्वीय निर्वहन में ईश्वरीय परमसत्य सर्वोच्च गुण सत्य गुण धारण करते हुए सात्विकीय वृत्तियों द्वारा परम सत्य रूप से अपने आचार आचरण को सम्हाल कर रखते हुए उनका प्रबन्धन करना ।

संसार में , समाज में, मानवीय जीवन में , व्यक्ति की बुद्धि विवेक ज्ञान में पली बढ़ी मृग तृष्णा स्वरूप में ऐषणा ऐं धनैषणा , पुत्रैषणा , मोहेषणा, लोकेषणा इन सब का तन मन इन्द्रियों के ध्यान ज्ञान, भाव विचार से पूर्णतया मुक्त रहना अथवा मुक्त होना I

ऐसा आचरण चरित्र जीवन की प्रत्येक कर्म धारा में परम सत्य रूप से । पूर्णतया जीना । ऐसी जीवन पद्धति जो भी व्यक्ति जीता व अपनाता वह ईश्वर, संसार , जीवन की हर विषयोक्त धारा में जो भी हो पूर्ण सफल व सिद्ध हो जाता है और ऐसा ही व्यक्ति परम सत्य ईश्वर का संसारीय पंच विकारीय जीवन पद्धति सत्य रुप में जीते हुए संसारीय भवसागरीय समुद्र पार करते हुए ईश्वर का साक्षात्कार कर पाता है कर लेता है I यही ईश्वर संसार और मानव जीवन का परम सत्य अध्यात्म है।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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