आज वर्तमान में मानव शरीर की अंतः करणीय आत्मिक उद्गार (आवाज) मानव तन मन जीवन में कलुषितता व निज सुख स्वार्थ प्रेरित लोभ लालसा का प्रवेश होने, रहने कारण वह अपने सत् सद् सत्य आदर्श मर्यादा सभ्यता संस्कृति आचार, सत्याचरण ,आत्मीयता, मानवीयता सभी से दूर होता चला जा रहा है । ईश्वर की परमसत्ता सर्वोच्च सत्ता के प्रिय आचरण अपनी जीवन कार्य प्रणाली में नहीं अपनाता , ना ही मानता । बल्कि उनके विपरीत आसुरी दानवी आचार आचरण में अपने जीवन जीने की पद्धति में, जीवन कार्य व्यापार में , जीवन कार्य व्यवहार में अपना रहा है। जिसका ही परिणाम आज विश्व में जीवन के हर स्तर पर सुख आनंद प्रभावित होते रहते हुए सर्वत्र मानवीय जगत में त्राहि-त्राहि मची हुई है । आज का मानव अहंकार से प्रेरित होकर रह कर तम (अंधकार ) से ओतप्रोत होता हुआ घोर अंधकार की ओर निरंतर बढ़ रहा है छल छद्म ,झूठ पाखण्ड , धोखा दगा, अन्याय अत्याचार उसके तन मन जीवन की फितरत में समावेश हो चुके हैं। जिनका नतीजा लूटखसोट , हत्या मर्डर , चोरी डाका, अपहरण, बलात्कार, अन्याय अत्याचार के रुप में राष्ट्रों का अन्य राष्ट्रों के प्रति अपने राष्ट्रों की सीमा विस्तार करने के लिये अनायास ही एक दूसरेपर युद्ध थोप रहे है । युद्ध देने लेने को लालायित हैं। जिनमें हजारों लाखों सैनिकों का जीवन हताहत होता हैं। हो रहा है। परमसत्ता सर्वोच्च सत्ता की सत्य न्याय नीति कहीं किन्ही भी लोगों में धर्म के धर्मावलम्बियो में खाली जिव्हा से प्रवचन और धर्म आडम्बर के अलावा कहीं आत्मीयता, मानवीयता, मानवता का सत्य व प्रत्येक के प्रति पारस्परिक आत्म संवेदन शीलता दृष्टिगोचर नहीं हो रही है । सिवाय विस्मृत व लोभ के अलावा । पारस्परिक अहंकार भरपूर स्तर पर व्यक्ति के तनमन जीवन में जीवनकर्म में भरपूर रूप से निरन्तर चाहे वह राजा हो या प्रजा । शासकीय बड़ा अधिकारी हो या छोटा कर्मचारी, न्याय अधिकारी हो या अपराधी , दैनिक जीवन उपयोगी वस्तुओं का उद्योगपति निर्माता हो या वस्तुओं का विक्रय करने वाला व्यापारी Iवह सबमें असत्यमयी , अन्यायमयी अपना आधिपत्य जमाये चला जा रहा है। वाह रे ईश्वर परम आत्मा यह कैसी विडम्बना है सत्व गुण , सात्विकीय प्रवृत्ति ,सत्याचार , सत्यनीति आज धूमिलता की ओर निरन्तर बढ़ती जा रही है और अहंकार ,छल छद्म ,झूठ पाखण्ड, अन्याय अत्याचार, अपना पैर पसारता हुआ मानव जीवन को भारी बोझिल, सत्य आंतरिक आत्मिक सुख शांति से आनंद से वंचित करता हुआ ईश्वरीय परम सत्य आत्मायी संतोष से अति दूर करता हुआ मानसिक विकृतियों को ज्यादा संसार समाज में निरन्तर जन्म देता हुआ सर्व विनाश की ओर अग्रसर करता चला जा रहा है । परिणाम क्या होगा? वही सृष्टि सृजेता पालन हार उत्थान प्रदाता संहारकर्ता ही जाने। मानव बुद्धि विवेक तो निज सुख स्वार्थ में इतना डूबता चला जा रहा है कि उसे सत्य असत्य का, नैतिकता अनैतिकता का,अन्याय अत्याचार का भेद दिखाई ही नहीं दे रहा है । उसके ( व्यक्ति के ) आंखों में तन मन के जेहन में पारस्परीय विनाश शीलता के अलावा कुछ अच्छा व सच्चा आज वर्तमान में नहीं दिखायी दे रहा है । हे परमेश्वर , हे जगद्पिता, हे जगदीश्वर, हे परममाता इस सृष्टि मानव समुदाय को सत्य सद् सत् आत्मीयता भावीय सद् बुद्धिमत्ता , सद् विवेकशीलता प्रदान करे। जिससे सृष्टि जगद् में अति विनाश शीलता का मंजर रुके और सृष्टि जगद् में सुख शांति का राज्य विस्थापित हो तथा वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वेभवन्तु सुखिनाः की रीतिनीति विश्व में प्रतिपादित हो।
हे मानव ! छद्म जीवन जीना छोड़ दे ! यदि यथार्थ में परम सत्य सत्येश्वर की परम सत्य दया , कृपा , स्नेह को परम सत्य रूप में पाना चाहता है , उनकी प्रियता का सत्पात्र बनना चाहता है तो?
” छोड़ दे छल – दम्भ को, झूठ – पाखण्ड और घमण्ड को । प्राणियों से प्यार कर, आत्मा का मूल सत्य हृदय से स्वीकार कर, जीवन तेरा संभल जायेगा, यथार्थ सत्य (ईश्वर) को पा जायेगा । उस सत्येश्वर अखिलेश्वर का सार यही है l परमेश्वर को पाने का मात्र मूल आधार यही है। ”
“धड़कता हूँ प्राणियों की धड़कनों में मै ही , दीन दुःखियों के दिलों के सिसकनों में मै ही । “
“राम और रहीम , ईसा और मूसा उन्ही को मिलते हैं , जीव, प्राणी मानवों से प्यार करना जिन्हे आता है । “
-डाoबनवारी लाल पीपर “शास्त्री”


