आज हमारे देश में नैतिकता की गिरावट व अनैतिकता को बढ़ावा देश के पूर्व एवं भावी कर्णधारों से ले कर जनमानस तक ने दिया है। जिसका ही परिणाम वर्तमान में सम्पूर्ण देश के सामने एक भ्रष्ट्र आचार रूपीय चिंगारी के रूप में उभर रहा है। आज हमारे देश में मानव हितकारी योजनाएं इसी से ही प्रभावित हैं। जिन्हे हम निम्न रूप में देख रहे हैं। तो आइये हम वर्तमान में शिक्षा जैसी मानव जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता का स्वरूप ही देखें । आजकल कुछ समय से शिक्षा का स्तर मात्र कागजों पर खोखले रूप में चल रहा है। वास्तविक ज्ञानार्जन कराने व देश की भावी पीढ़ी को मजबूत शिक्षित बनाने में नहीं । शिक्षण संस्थायें मात्र एक अर्थ उपार्जन की दुकानें भर रह गयीं हैं। इससे शिक्षा का स्तर निरन्तर गिरता चला जा रहा है। पैसे पर ही शिक्षा निर्भर हो गयी है। अब देखिये मानव जीवन के अति आवश्यक पहलू स्वास्थ्य सेवा पर आज हमारे जनमानस के स्वास्थ्य की देखरेख करने वाले चिकित्सालयों की व्यवस्था भ्रष्ट्र आचार व अनैतिकता से लिप्त दानवता की परिचायक आत्मीयता विहीन , इन्सानियत रूपी सच्चाई का गला घोंटने वाली पंगु कर दी गयी है। तली से लगाकर चोटी तक संरक्षण करने वाले व्यवस्थापकों ने अपने हितों के लिए ही व्यवस्थित करके इन्सनियत व सत्य पारदर्शिता पूर्ण कर्तव्य निष्ठा पर दाग लगा रखा है । चिकित्सालय में मरीज के प्रविष्ट होते ही छोटे कार्यकर्ता से लेकर बड़े -बड़े भगवान का स्वरूप कहलाने वाले छलीय छद्मीय मानसिकता ग्रसित डाक्टरों को तो बस पैसा ही व धन ही याद आने लगता है । जिस कारण अपने कार्य व कर्तव्य को एक तरफ रखते हुए बस मरीज का दोहन करने में लग जाते हैं। जो रोगी , गरीब व अभाव से ग्रसित हैं। उन्हें तो कभी-कभी मात्र इन्ही कारणों से अपनी जान तक भी गंवानी पड़ती है। क्या यही शासन तंत्र की मानव जीवन रक्षक व्यवस्था है ? क्या वह लोग जो इस व्यवस्था हेतु कार्यरत हैं अपनी रोटी इसी व्यवस्था हेतु दिये गये पारिश्रमिक से नहीं चलाते हैं फिर वह लोग अतिरिक्त धन प्राप्ति की कल्पना पूर्ति हेतु रोगी के साथ अन्याय अत्याचार क्यों करते हैं , क्या यह उनकी बेईमानी नहीं है। हराम का धन पाने की लालसा से लोगों की जान जाती हैं , क्या वह उनका सत्कर्म है । उन्हे ऐसे घृणित कार्यों से लज्जा या शर्म महसूस नहीं होती। इसका मुख्य कारण है। इस भृष्ट्र आचार रूपी प्रक्रिया से प्राप्त धन ने उन लोगों की बुद्धि नष्ट भ्रष्ट्र कर दी है । उन्हें दिखाई ही नहीं दे रहा कि क्या सही है और क्या गलत ।
अब आइये हमारी मुख्य न्याय मन्दिरों की व्यवस्था पर न्यायालयों में व्याप्त भ्रष्ट्र आचार ने गरीब जनता को वास्तविक सच्चे न्यायपूर्ण फैसले की आशा से वंचित कर दिया है। धन एवं आतंक का पलड़ा व बेईमानी की नियत भारी होने पर हार जीत में बदलती है और जीत हार में । इस व्यवस्था से हमारे देश के जनमानस का विश्वास ही डगमगा गया है। बेचारे अन्याय अत्याचार सहते हुए अपने जीवन की गाड़ी प्रताड़नाओं की द्वन्दात्मक स्थिति में खींच रहे हैं व मरते हुए जी रहे हैं। कुछ कह सकते नहीं क्योंकि कहीं कोई दीन हीन , निर्बल दुर्बल , गरीब कमजोरों की कोई सुननेवाला नहीं है। स्वयं में सक्षमता की शक्ति है नहीं । शासन द्वारा दी गयी व्यवस्थायें आदमी व शक्ति देखकर क्रियान्वित होती हैं तो अब आम आदमी क्या करे उसे वश बेबस सहना व रहना है।
बस यही हाल हमारे देश की जनमानस के प्रति दी गयी शासन तन्त्र द्वारा सभी व्यवस्थाओं का है। आज अगर हम इस भ्रष्ट्र आचार को बीसवीं सदी के अन्त व इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ तक की ” भ्रष्ट्र मानव-भ्रष्ट्र युग “ का नाम दे दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । आज इस भ्रष्ट्राचार के सूत्रपात ने मानवता की जड़े हिला दी हैं और आत्मीयता का अर्थ समाप्त कर दिया है । सामाजिक सहयोगिता का नाश कर दिया है, इंसान को इंसान के खून का प्यासा बना दिया है अथवा इंसान को शैतान बना दिया है। आज मनुष्य इंसान सच्चाई व सत्यकर्तव्य दायित्व की वास्तविकता से कोसों दूर मात्र इसी भ्रष्ट्राचार के कारण ही हो गया है। यह भ्रष्ट्राचार रूपी रोग राष्ट्रविनाश , विश्व विनाश व मानवविनाश की ओर निरन्तर बढ़ता चला जा रहा है। इस रोग के उपचार हेतु कहीं कोई शोध रिसर्च विचारकर्ता दिखाई ही नहीं दे रहा है। अगर हमारा सारा व्यवस्था तंत्र इस रोग के विनाश के लिए जुटा होता तो यह रोग ऐसे भयंकर संक्रामक उग्र रूप में विकसित होता हुआ दिखाई न देता । हमारे देश के कर्णधारों सत्ता आसीन व समाज के ठेकेदारों जो कि स्वयं भ्रष्टाचार रूपी रोग से ग्रसित हैं। झूठे खोखले भाषण व झूठी सान्त्वनाएं देश की आजादी के बाद से देते चले आ रहे हैं। लेकिन झूठ व आचरण विहीन बातें तो झूठी ही रहती हैं। क्योंकि रेत से घरौंदा बनता है घर नहीं । यही हाल नेतृत्व सम्हालने वालों का है। ” कहते हमसे त्याग करो , खुद त्याग को त्यागे रहते हैं। भरते हैं घर काले धन से , विवश जनता को मरने को करते रहते हैं । “ हम सोचें ? इस भ्रष्ट्र आचरण को अपनाकर, दूसरों को दुःख पहुंचाकर उनके साथ अन्याय करके सुखी रह सकते हैं ? कदापि नहीं । यदि व्यक्ति अपना सत्य आत्महित व सत्य सर्वहित सत्य रूप में चाहता है तो इस झूठे खोखले व भारत देश को खोखला करने वाली भ्रष्ट्र आचार रूपीय दल दल से अपने को निकालना होगा तभी यह मानव विनाशकारी भ्रष्ट्राचार रूपी कैंसर इस तरह दूर हो सकता है । इस अभिशाप को सारा समाज मिलकर के खत्म कर डाले तभी अच्छा देश व अच्छा समाज सर्वसुख शान्ति पाने वाला पुनः निर्मित हो सकता है प्रत्येक व्यक्ति सत्य आचार बनाये व सत्यका पालन करे तभी इस बेईमानी विनाशकारी प्रथा का अन्त सम्भव है। अन्यथा यह भ्रष्ट्राचार रूपी कैंसर मानव ( नर नारी , स्त्री पुरुष ) जीवन व सारी योजनाओं का सत्य पारदर्शीय रूप लीलता चला आ रहा है और लीलता चला जायेगा ।
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री “


