परमेश्वरीय प्रकृतिसत्ता सर्व समर्थ सर्वशक्तिमान सर्वदाता प्रदाता सृजन , पालन , संहारण शक्तिसे ओत प्रोत जिसे कहीं कोई मानवीय जगत से कोई सेवा सुश्रूसा , छप्पन भोग, हीरा मोती , सोना-चांदी की कोई आवश्यकता नहीं। मनुष्य अपने जो यथार्थ प्रकृतेश्वरी द्वारा प्रदत्त दायित्व कर्तव्य स्वयं के प्रति , घर परिवार के प्रति , संसार और समाज के प्रति , राष्ट्र और विश्व के प्रति पूर्ण परम सत्य दायित्व अपने समान मेहनत परिश्रम और तन मन की एकाग्रता के साथ उनमें तल्लीन रहने की एकाग्रता प्रकृति सत्ता चाहती है । हे मानव (नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) तुम उस स्वरूप को क्यों नहीं धारण करते तुम्हारे स्वयं का, घर परिवार का, संसार समाज का , राष्ट्र और विश्व का सत्य कल्याण ,सत्यविकास , सत्य सुखशान्ति और आनन्द तभी सत्य संभव है। आंखे खोलो, दिलदिमाग के ताले खोलो । परमेश्वरीय प्रकृतिसत्ता की सत्य आशा अपेक्षा उस जैसे सर्वमंगलीय आत्म साधना की परिश्रमीय आशा अपेक्षा की पूर्ति ही व सर्वोपरि सर्वप्रेमीय रूप, रंग से जीवन संचालन करना यही उसकी सत्य पूजा है। आराधना है, श्रृद्धा है , भक्ति है और आस्था है। जागो और प्रकृतेश्वरी सत्ता का सत्य अभिप्राय समझो और मात्र उपरोक्त वार्णित सत्य कर्तव्य दायित्व का पूर्ण परमसत्य निर्वहन करो । प्रकृति सत्ता परमेश्वर पाषण आकृतियों में नहीं है । वह जीवन चेतना स्वरूप से स्वरूप में आत्मा तत्त (सार) से मानव (नर नारी , स्त्री पुरुष ) शरीर, जीव जन्तु, प्राणी, पशुपक्षी के स्वरूप में विद्यमान हैं। वह साश्वत प्रत्यक्ष प्राण चेतना , जीवन चेतना स्वरूप है। इसलिए पूर्ण सत्य ईमानदारी से पारदर्शिता परक साश्वत परमात्मा की सेवा सुश्रूषा करो, पारस्परिक प्रेमवत रहो । समग्र सृष्टि सत्ता तभी सत्य आनन्दमय सर्वजगत होगा, रहेगा। अर्थात् समझो जिस जगद् पिता प्रकृतेश्वरीय सत्ता परम माता को किसी से सेवा पूजा कराने की कोई आवश्यता नहीं है , मनुष्य (नरनारी) उसकी तो सेवा पूजा करता है और उसके प्यारे पुत्र जो नाना प्रकार के अभावों से ग्रस्त हैं उनके साथ दुर्व्यवहार करता हुआ उन्हे नाना प्रकार की यातनाएं देता है। सोचो ? सर्व दाता विधाता प्रकृतेश्वरीय सत्ता क्या ऐसी भाव विचारधारा की आशा अपेक्षा करेगा । कभी नहीं । जैसे एक घर परिवार के पिता-माता अपने बच्चों को एक साथ रहने की अपेक्षा करते हुए परम आनन्द खुशी की प्राप्ति करते हैं। इसी तरह प्रकृति सत्ता स्वरूपीय परमेश्वर सकल सृष्टि के अपने मानवीय समुदाय ( नर नारी , स्त्री पुरुष ) से पारस्परिक प्रेममयी आत्मवत् , आत्मीयतावत् की सत्य आशा अपेक्षा करता है। हम सब ऐसे बनें कि अपने परमेश्वरीय प्रकृति सत्ता को इसी पूजा, आराधना , श्रद्धा , भक्ति, आस्था से परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें।

-डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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