वाह रे ! बौद्धिक विकास । वाह री ! उच्च शिक्षा एम. एससी. , बी. एड. अपने सौहार्द्यमयी ग्रहस्थ जीवन में अनौचित्य पूर्ण अपेक्षायें करके, अपेक्षाओं को पाल के अपने सुखद स्थिति पूर्ण अपना दामपत्य जीवन बिगाड़ना, खराब करना , दरारें पैदा कर लेना ।
जीवन कैसी विडम्बना है अथवा मानव ( नरनारी , स्त्रीपुरुष ) मन-तन इनका मनोभाव , मनोसोच, मनोचिन्तन, भाव विचार दम्पत्ति जोड़ा अपने सत्य सुखमयी जीवन में अज्ञानता , कुबुद्धि के शिकार होकर अपने ही हाथों से अपने ही सौहार्द्र पूर्ण जीवन में अपने ही अविवेक व अपनी ही दुर्बुद्धि का परिचय देकर अपने से अपने ही सुमधुर जीवन में आग लगाते हैं। अथवा लगा लेते हैं। हे परमसत्ता यह कैसी शिक्षा , कैसे पारिवारिक संस्कार, कैसी मनो इच्छा , कैसा मनोभाव यह जीवन की विकृतिमयी विडम्बना जीवन में क्यों होती है? क्यों आती है । वर-वधू चुनते समय ऐसी सद् सत् सत्य बुद्धि , सत्य विवेक व्यक्ति कहां से लाए ? कि दोनों (वर-वधू) का सत्य चयन कैसे हो ? जो भावीय भविष्य में पारस्परिक विघटन की स्थितियां अंशमात्र भी उत्पन्न न हों। और दम्पत्ति जोड़ा सुखदरूप में जीवन की यात्रा परिपूर्ण करे । ताजीवन सही जीवन जिए , ताजीवन सही जीवन चले। हे परमेश्वर , हे परमसत्ता, हे प्रकृतेश्वरी माता ऐसी दया दम्पत्ति स्वरूपों पर अवश्य कर । कि कोई भी एक पक्ष रुवरूपीय रूप अविविवेक कुबुद्धि और मनो विकृति सदा अज्ञानमयी स्वरूपों का जीवन की सम्पूर्ण यात्रा में अंशमात्र भी शिकार न हो तथा किसी एक के भी मन में विघटनमयी भाव विचार न आयें , न पैदा हों और ना ही उपजें ऐसी दया कर कृपा कर हे सृष्टि के संरचनाकार , हे सृष्टि के सृजेता परम पिता परम माता दया कर , कृपा कर, रहम कर मानव (नर नारी , स्त्री पुरुष ) की अज्ञान जनित मनो विकृति , मनो प्रवृत्ति व मनो प्रकृति से पापमयी दोष पूर्ण अपराधों को क्षमा कर , दया कर -दया कर, क्षमा कर – क्षमा कर सत्य सद्बुद्धि , सत्य सद् विवेक दे । सद् सत्यज्ञान दे । जिससे हम सभी मानव (नर नारी , स्त्री पुरुष ) अपना सद् जीवन बना सकें, सद्सत्य जीवन पारस्परिक प्रेम मयी जी सकें और आपका आभार आपके प्रति कृतज्ञता हर पल , हर क्षण सदैव हम सभी व्यक्त करते रहें ।
हे परम पिता – परममाता , हे जगद् ईश्वर सर्वोच्च सत्ता मुझ मानव स्वरूपों ( स्त्री पुरुषों ) को मन को जीतने की शक्ति दें । भक्ति दें, सत्यज्ञान प्रकाश दें । कि हम सभी लोग नश्वर संसारीय पंच विकारीय ( काम , क्रोध, लोभ , मोह, अहंकार ) भोग , वैभव ,ऐश्वर्य असत्याचारीय रूप रंगों की लोभ लालसा का वशीभूत कभी भी न होऊं तथा उन क्षणिक सुखीय छद्मीयआकर्षणों की फांस में फंसकर व प्रलोभनों का वशीभूत होकर अपने सत्य आचारीय चरित्र को अंशमात्र भी कभी न गिरायें व कभी न गिरने दें। ” वह शक्ति हमें दो परमेश्वर / परमेश्वरी ( जगद्पिता , जगद्माता ) हम सभी पारस्परिक एक दूसरे के प्रति सत्य आचारीय रूप से सत्य कर्तव्य दायित्व निभायें । हम दम्पत्तियों के तन , मन में जीवन में जब तक आखिरी सांस रहे , पारस्परिक सत्य प्रेममयी रहें और जीवन के अन्त तक सत्य प्रेम रखें और बनायें ॥
– डा० बनवारीलाल पीपर “शास्त्री”



