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दलित वर्ग के सामने सबसे बड़ा प्रश्न – वह किस-किस से संघर्ष करे?

रिपोॅट: – डॉ. बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समानता, गरिमा और न्याय का अधिकार प्रदान करता है। इसके बावजूद समाज के अनेक वर्ग आज भी यह अनुभव करते हैं कि उन्हें सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्तर पर अपेक्षित अवसर और सम्मान प्राप्त नहीं हो पा रहा है। इन्हीं परिस्थितियों पर विचार करते हुए यह प्रश्न उठता है कि यदि समाज का सबसे वंचित व्यक्ति स्वयं को असहाय महसूस करे, तो वह अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किस-किस से संघर्ष करे?
इतिहास साक्षी है कि भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता पर लंबे समय से विमर्श होता रहा है। आज भी यदि किसी व्यक्ति के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव, अपमान या हिंसा की घटना होती है, तो वह केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंतन का विषय है।

ऐसे मामलों में संविधान और कानून सभी नागरिकों को न्याय प्राप्त करने का अधिकार देते हैं तथा संबंधित संस्थाओं का दायित्व है कि वे निष्पक्ष एवं संवेदनशील ढंग से कार्य करें।
लेखक का मानना है कि लोकतंत्र में जनता को अपनी बात शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से रखने का पूरा अधिकार है। साथ ही शासन और प्रशासन का दायित्व है कि नागरिकों की शिकायतों को निष्पक्षता, संवेदनशीलता और विधि के अनुसार सुना जाए। यदि कहीं किसी प्रकार का अन्याय या अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उसका समाधान कानून के दायरे में होना चाहिए।
इसी क्रम में लेखक ईश्वर से भी प्रश्न करता है—
हे परमेश्वर! यदि समस्त मानवता आपकी संतान है, तो मनुष्यों के बीच इतना भेदभाव, घृणा और अन्याय क्यों दिखाई देता है? क्या कभी ऐसा समय आएगा जब प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के सम्मान, समान अवसर और न्याय प्राप्त होगा?
यह प्रश्न केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।
लेखक स्वयं से भी एक आत्ममंथन करता है—
जब मुझे ज्ञात है कि अत्यधिक मानसिक तनाव और निरंतर संघर्ष मेरे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं, तब भी मैं इन प्रश्नों को उठाने से स्वयं को रोक क्यों नहीं पाता? शायद इसलिए कि समाज में न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना की आकांक्षा मनुष्य के अंतर्मन की सबसे बड़ी पुकार है।
आज आवश्यकता किसी वर्ग को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की नहीं, बल्कि संविधान में निहित समानता, बंधुत्व और न्याय के मूल्यों को व्यवहार में उतारने की है। सामाजिक समरसता, पारस्परिक सम्मान और कानून के प्रति आस्था ही एक मजबूत और विकसित भारत की आधारशिला बन सकते हैं।
(यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय, संस्था या संवैधानिक निकाय की मानहानि करना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों पर सकारात्मक विमर्श को प्रोत्साहित करना है।)
डॉ. बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

हे भगवान , हे परमेश्वर, हे जगद्‌पिता , हे जगद् माता क्या यह तेरी इच्छा है ? बताओ प्रभु , आओ प्रभु , बताओ प्रभु ?

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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