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दलित वर्ग के सामने प्रश्न ? ( उसे सबसे गिरा इन जातिगत स्वरूप धारियों द्वारा वर्गीकरण करके , एक समान मानव को बनाया गया दलित )

वह किस किस से लड़े । शरीर अक्षम अशक्त, दुर्बल-निर्बल, निर्धन-गरीब , धनहीन , जरहीन नब्बे प्रतिशत सही से रोटी सब्जी न खाने वाला । किस-किस से लड़े नम्बर एक , नम्बर दो, नम्बर तीन फिर उससे निम्न शल शुद्र (छूने वाला , छुलाने वाला ) जिसे पिछड़ा वर्ग का रूप दिया गया I उसके बाद सबसे निम्न हासिये पर दलित, अछूत जिससे (अन्न आहार न छुलाने वाला , चौका चूल्हे से दूर रखने वाला व आहार भोजन आदि न छुलाने वाला न छूने वाला ) अति शूद्र , सर्वोपरि शुद्र । जाति वर्गीकरण निर्माताओं ने सबसे ऊपर तीन वर्ण उसके उपरान्त शल शुद्र वर्ण (पिछड़ा वर्ग ) बड़े बुद्धि विवेक के हिसाब से, सूझ बूझ से बनाया। उन्हे दलित से बड़े होने का वर्णगत तमगा लगाया जो अपने जातिगत बड़प्पन के अहंकार में लड़ने , दबाने , मारने ,पीटने को सबसे निम्न दलित वर्ग को सदैव तैयार रहते हैं अन्याय करने को तैयार , अत्याचार करने पर भी पीछे नहीं (दलित अब किस-किस से लड़े ) राजातन्त्र से लड़े , शासन तंत्र से लड़े । सबसे निम्न अछूत होने के कारण उपरोक्त वर्णित उच्च समाज के जनमानस की गालियां सुने , अन्याय अत्याचार सहे, रक्षा के नाम पर सृजित किये गये पुलिस ( सिपाही , अधिकारी ) तन्त्र से लड़े । सत्ता तन्त्र में बैठे अन्यायी अत्याचारी क्या बतायेंगे ? जो खुद अन्याय अत्याचार , अपने सुख शान्ति आनन्द , पद प्रतिष्ठा में / को सदैव बनाये रखने की इच्छा में झूठ फरेब , बेईमानी, धोखा दगा , विश्वासघात, अन्याय-अत्याचार भारत के विशेष जनमानस पर करने को उद्धत है। हे भगवान , हे परमेश्वर , हे सर्वोच्च सत्ताधारी , हे प्रकृतेश्वर (  हे पिता परममाता ) क्या तूने ही शैतान को बनाया ? क्या तूने ही सृष्टिमानव के प्रति मानव में शैतानीय बुद्धि विवेक व शैतानीय हरकतों को प्रादुर्भाव किया I सृजन किया , तो क्यों किया ? क्या तू नहीं चाहता ? कि धरती में विद्यमान मानव जाति अथवा मानव पूर्ण सत्य सुख शान्ति से रहे ? हे परमेश्वरीय सत्ता अथवा यह धूर्तेश्वरीय , पाखण्डीय , उच्च रूप धारी मानवीय सत्ता आपस में अपने-अपने सुख ऐश्वर्यमयी भोगों की इच्छाओं की पूर्ति की हेतु नैतिकता का सत्य परिचय न देते हुए । अन्यायी अत्याचारीय रूप स्वरूप का लोभ लालसाओं से ग्रसित होकर पारस्परिक एक दूसरे के प्रति अन्याय अत्याचार करते हुए एक दूसरे को लहू लोहान करते हुए जिएं और मरें ? उत्तर दो। हे परमेश्वरीय भगवानीय सत्ता उत्तर दो ? क्यों उत्तर नहीं देते , ऐसा क्यों ? तुम हो भी या नहीं ? क्या तुम्हारे नाम का भ्रम फैलाया गया है ? तुम गूंगे हो , बहरे हो , अन्धे हो जो सृष्टि में इतने बिगड़े हुए स्वरूप पर भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हो बताओ भगवान नाम के स्वरूप बताओ । यह सब उपरोक्त लिखने वाले लेखक से अन्तरआत्मा ने प्रश्न पूछा ।

एक प्रश्न तुमसे भी ? तुम जानते हो कि ज्यादा बोलने से तुम्हारे शरीर में दिक्कत हो रही हैं और दिक्कतें रोग बीमारी पैदा कर सकती है और शारीरिक मानसिक दिक्कतें बढ़ सकती हैं। तुम्हारे बोलने से फिर भी तुम इस सत्य को क्यों नहीं मान रहे हो और तुम अपने को बोलने से रोक नहीं पा रहे हो ऐसा क्यों ?

प्रजातंत्रीय मानव को सत्ताआरूढ़ अभिमानी शासन तंत्रीय शक्ति से ओत प्रोत अहंकारीय स्वरूप से दुर्व्यवहार, मारपीट, अपने सत्य जीवन आवश्यकीय रूप स्वरूपीय आत्म निर्भरीय स्वरूपीय राजसत्ता से शासन सत्ता से प्रश्न करने के प्रयत्न करने पर लाठी,डण्डों, बन्दूक , तमन्चों से सत्ता तंत्र, शासन तंत्र, प्रजा रक्षक संगठन प्रजा को ही मार रहा। क्या हे परमेश्वर क्या ये तेरी इच्छा है। बताओ ऐसा क्यो ? राजतन्त्र , शासनतंत्र में बैठे अनके सत्य कर्तव्य दायित्वों के सत्य निर्वहन न करने ,न होने का उत्तर उनसे जनता मांग रही है । और वे निहत्थे भारत के जनमानसों पर लाठी , डण्डा , गोली बरसा रहे हैं । हे भगवान , हे परमेश्वर, हे जगद्‌पिता , हे जगद् माता क्या यह तेरी इच्छा है ? बताओ प्रभु , आओ प्रभु , बताओ प्रभु ?

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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