परमात्मा, संसार-समाज और जीवन सत्य दर्शन ।

रिपोर्ट: डा० बनवारीलाल पीपर,शास्त्री 

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  • ईश्वर अदृश्य है और साकार है,निराकार है ।
  • आत्मा शरीर में विद्यमान है ।
  • संसार-समाज पंचविकारो (काम, क्रोध,लोभ,मोह, अहंकार) की धारा में बह रहा है, चल रहा है ,जी रहा है मर रहा है ।

मानव जीवन आचार द्वंदात्मक स्थिति सत्य-असत्य में डोल रहा है,भृम मे हो रहा है कि भटकता हुआ,यह करें कि वह करें संदेहात्मक रूप में जी रहा, मर रहा एवं अशान्त होता हुआ

पृलोभनीय स्थिति में दो के बीच में पिस रहा है धन सम्पत्ति सब कुछ होते / रहते हुये भी कभी हंसना, कभी रोना। भोगों का उपभोग भरपूर करते हुये भी सुख शांति से व्यक्ति वंचित हैं ।

कारण है सत्य से दूरी ।

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  • असत्य की सानिध्यता रत रहते हुये जीवन कर्मो का संचालन।
  • भोगों के लाख भोगने के बावजूद पर भी अतृप्ती अपूर्णता।
  • असंयमित जीवन होने कारण जीवन भोगों को नहीं भोग रहा बल्कि भोग जीवन को भोग डाल रहे हैं।

समझो :

जीवन को हर विषय स्वरूप से,आत्म संयमित बनाओ

तभी आत्म आनंद,आत्म सुख एवं परम सत्य आत्म कल्याण सत्य रूप में संभव है।

सदाचार एवं सद जीवन का ईश्वरमयी सत्य तात्विक विष्लेषण सद् गृन्थों में इसे ही माना जाता है इसलिए

जीवन को परम सत्य आनंदमयी बनाने के लिए उपरोक्त स्वरूप से व्यक्ति को अपना जीवन संचालन करना चाहिए।

मनुष्य को पहले स्वयं सत्य का साक्षात्कार करना चाहिए।

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इंसान को अपने जीवन के लिए वह रास्ता अपनाना चाहिए जिसके अंत में शांति, सुख और परमात्मा की प्राप्ति हो। जिन मार्गों पर ये नहीं मिलते उन पर चलकर दुख, अशांति और निराशा की प्राप्ति होती है।
मनुष्य को पहले स्वयं सत्य का साक्षात्कार करना चाहिए।

जिस प्रकार एक आध्यात्मिक व्यक्ति की साधना सम्यक होती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी चाहिए कि वह अपने जीवन में तथा क्रियाकलापों में एक सम्यता बनाए रखे।

 

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