कथा दौरान बताया कि वास्तविक रूप में काम का विनाश ही महारास है व
■गोवर्धन भगवान के महात्म्य को बड़े ही भाव से समझाया पूज्य श्री रमाकांत व्यास ने।

उरई गडहर में स्थित दौदेरिया फार्म हाउस पर चल रही श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन व्यास श्री रमाकान्त व्यास रावतपुरा धाम ने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं को बड़े ही मार्मिक ढंग से समझाया।
साथ ही गोवर्धन भगवान के महात्म्य को बड़े ही भाव से समझाया और गोबर से बहुत सुंदर ब्रज बिहारी का गोवर्धन की पूजा करी।
पारीक्षित मीना दौदेरिया व नरेश दौदेरिया ( रिटा.वन दरोगा ) सतीश दौदेरिया और सुमित दौदेरिया ने पूरे विधि विधान से गोवर्धन भगवान को 56 प्रकार के भोग और अन्नकूट का भोग लगाया।
पूज्य कथा व्यास रमाकांन्त व्यास ने बताया कि प्रेम से भी पूजा भाव की पूजा कहलाती है। भाव से पूरित सुनी गई कथा पथभ्रष्ट लोगों को भी सत्मार्ग में लाकर मोक्ष की प्राप्ति का रास्ता प्रशस्त करती है।
स्वाभिमान का मतलब अपनी बात पर अड़े रहना नहीं अपितु सत्य के साथ खड़े रहना है।
दूसरों को नीचा दिखाते हुए अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रयास करना यह स्वाभिमानी का लक्षण नहीं, अपितु दूसरों की बात का यथायोग्य सम्मान देते हुए किसी भी दबाव में ना आकर सत्य पर अडिग रहना यह स्वाभिमान है
पूज्य रमाकान्त व्यस ने बताया कि अभिमानी वह है जो अपने अहंकार के पोषण के लिए दूसरों को कष्ट देना पसंद करता है।
स्वाभिमानी वह है, जो सत्य के रक्षण के लिए स्वयं ही कष्टों का वरण कर लेता है। स्वाभिमान व्यक्ति किसी को कष्ट नहीं देता अपितु दूसरों के स्वाभिमान की रक्षा करते हुए स्वयं कष्ट सह लेता है।
भगवान अपने भक्तों का बुरा कभी नहीं चाहते। जिस प्रकार भक्त भगवान को चाहता है उसी प्रकार भगवान भी भक्तों को चाहते हैं।
भक्तों के अंदर अहंकार पैदा होता है तो भगवान उसका शमन अवश्य करते हैं। ठाकुर जी द्वारा गोवर्धन पूजा की लीला कराना प्रकृति प्रेम का संदेश देना है।
प्रकृति में ही जीवन है यह बाते दौदेरिया फार्म हाउस प्रांगण में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के पांचवे दिवस की अमृत रूपी कथा में व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए परम पूज्य रमाकांत व्यास महाराज ने कही।
उन्होंने कहा कि संतों ने दर्शन कराया है कि गोवर्धन लीला का अर्थ है गो अर्थात अपनी इंद्रियों को संयमित करना।
गोवर्धन लीला का अभिप्राय गौ माता से है,
गौ संवर्धन ही गोवर्धन है।
गौ की रक्षा करना, उसकी सेवा करना हमारा पुनीत कर्तव्य ही नहीं परम धर्म भी है।लीला के बाबत उन्होंने बताया कि इंद्र को जब अपने पर अभिमान हुआ तो श्री ठाकुर जी ने उस अभिमान का शमन करने हेतु गोवर्धन लीला की।
आगे उन्होंने रासलीला पर चर्चा करते हुए कहा कि सांसारिक जीव रास में काम का दर्शन करता है, किंतु वास्तविक रूप में काम का विनाश ही महारास है।
रासलीला के दौरान जितनी भी गोपिकाएँ हैं वह ऋषि रूपा गोपिकाएँ है।
रास के समय ऋषियों ने गोपिका का रूप धारण करते हुए लीला स्थल पर पहुंचे और भगवान के साथ रासलीला करते हैं।
वास्तव में आध्यात्मिक दृष्टि से रासलीला में भगवान ने काम को पराजित किया है। आसुरी प्रवृत्ति का शमन करने के लिए भगवान अवतरित हुए।
वही :■ गोकुल की हर गली में मथुरा की हर गली में कान्हा को ढूंढता हूँ दुनिया की हर गली में “
■”मै तो गोवर्धन को जाऊंगी ।नहीं माने मोरो मनवा” भजन पर श्रद्धालु जन जमकर थिरके।
महाराज ने कहा कर्म करने में तो व्यक्ति स्वतंत्र है पर कर्म भोगने के लिए उसे तैयार रहना होगा इसलिए भक्तों कर्म करते समय हमें सावधान रहना है। महाराज ने कहा कि दिन में ऐसा कोई कर्म ना करो कि रात को सो ना सको और रात में ऐसा कोई कर्म ना करो कि सुबह मुंह दिखा ना सको।
इन शब्दों के माध्यम से उन्होंने भक्तो को समाज मे हो रहे दुराचारों से बचने हेतु सचेत किया।
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महाराज जी ने आगे के कार्यक्रम विषय पर बताया कि
अयोध्या धाम मे 23 नवंबर से 29 नवंबर तक 108 भागवत माला मे जो भी भक्तजन यजमान के रूप में प्रतिभाग करना चाह रहे हैं वह 51000 देकर अपना रजिस्ट्रेशन शीघ्र करा ले।





