कोई मूढ़, दुर्बुद्धि व्यक्तिगत मनोभावीय स्वरूप से किसी का भी बुरा चाहने वाला, किसी का भी बुरा करने की, बुरा कराने की मंशा ( इच्छा ) रखने वाला । उससे बड़ा इस समग्र सृष्टि पटल पर कोई अपराधी नहीं है  । मानवीय (नर-नारी , स्त्री-पुरुषीय ) जगद् से अथवा परमसत्ता जगद् पिता, जगद् माता के दृष्टि दर्शन से । व्यक्ति में ( नर-नारी , स्त्री – पुरुष में) क्रोध का इतना विकृति रूप जो बदला लेने की भावनाओं से ओत प्रोत होता है और रहता है । जो अति-अति-अति पाप अक्षम्य अपराध का स्वरूप है। मानवीय जगद् के दृष्टिदर्शन से और परमेश्वरीय प्रकृतेश्वरीय दृष्टिदर्शन से सोचो ? किसी का जीवन लेना , शिशु ,बालक, युवा, प्रौढ़, वृद्ध दम्पत्ति व किसी के बेटा बेटियों , माताओं बहिनों , भाई बहिनों का गला घोंटना, गला काटना , जान से मारना, जान से मरवाना, किसी के जीवन को समाप्त कर देना, समाप्त करवा देना । मेरे दृष्टि दर्शन से इससे बड़ा कोई अपराध अथवा पाप नहीं है। सोचो ? हत्या, मर्डर, व्यक्तिगत रंजिश का शिकार शरीरधारी , व्यक्ति जीवन चेतना प्राणधारी किसी का बेटा है, किसी का भाई है, किसी का पति है, किसी का पिता है , किसी की मां है , बहिन है , बेटी है। उसके प्राणों को हर लेना या हरवा लेना। उस घर परिवार की सारी खुशियां मिटा देना, हर लेना, छीन लेना, परिवार का बरबाद हो जाना , परिवार को बरबाद कर देना अति-अति-अति दुःखों का सागर उसके घर में उड़ेल देना। जो ताजीवन अति-अति असह्यनीय बेदनापरक उनका जीवन है । तब तक का दर्द देना, सारी पारिवारिक व्यवस्था पारिवारिक सदस्यों को जबतक पलने पुसने की,खाने पीने को सही ढंग से जीने की मिटा देना बरबाद कर देना, परिवार को भूखों मरने की कगार तक ले जाना । अति असह दुर्गति युक्त जीवन जीने के लिए मजबूर कर देना। सोचो हे मानवों ? क्या ये हल्का, छोटा पापयुक्त , अपराध युक्त विषय है। क्या? सृष्टि रचने वाला सृष्टि रचयिता इस प्रकृति सत्ता स्वरूप से सत्य सन्तुलन रखने वाला मानव शरीर को (नर नारी , स्त्री पुरुष ) को ऐसे अपराध , ऐसे पाप मयी कृत्य करने, कराने वाले को पुरुस्कार देगा । समृद्धि युक्त करेगा । ऐश्वर्यों का भोग कराएगा । क्या ? वैभव युक्त सुख शान्ति आनन्द देगा या आत्मसन्तोष प्रदान करेगा अथवा करायेगा। हे मानव समुदायी भाइयों (नर-नारी , स्त्री-पुरुषों ) होश में आओ । क्योंकि व्यक्ति जो बोता है वही उसे काटने को मिलता है। भले ही कुछ काल तक अतृप्ति पूर्ण असत्य स्वरूपीय मनोशान्ति व्यक्ति अनुभूत कर ले , परन्तु दीर्घ काल तक नहीं। जगद् नियामक सृष्टि संचालन करने वाला परमात्मीय अस्तित्व अपने को प्रकृति स्वरूप में दिखाने वाला सर्व शक्तिमान , सर्वसमर्थ, सर्वन्याय दाता ही सच्चा सत्य न्याय करता है। रिश्वतखोरी, चापलूसी, चाटुकारिता ,करो कुकर्म और दिखावा में मन्दिर, मस्जिद, चर्च , गुरुद्वारा में सजदा करो, माथा टेको और रामायण, भागवद् , कुरान , बाईबिल , गुरुग्रन्थ साहिब अदि की पाठ पूजा करने करवाने की दुहाई दो। यह परमेश्वरीय सत्ता में उसे धोखा देने के लिए पर्याप्त नहीं है। करनी कुछ और कथनी कुछ। सोचो ? विभिन्न – विभिन्न वासनामयी, धन सम्पत्ति ऐश्वर्यीय भोगीय कामनाओं की इच्छापूर्ति में जो पाप कर्म करते हो । दूसरों को दुःख देने का बीज बोते हो वह कभी भी छद्मीय छलीय काण्डों से, धोखे बाजी, दगाबाजी , विश्वासघातीय, पाखण्डीय स्वरूपों से , कभी भी कोई भी वैभवपूर्ण, सुखशान्ति आनन्दपूर्ण रूप कभी नहीं मिलता । कभी फलीभूत नहीं होता । परमेश्वरीय सत्ता, प्रकृतेश्वरीय सत्ता, के न्याय में देर हो सकती है परन्तु अन्धेर नहीं होता है। चाहे जितना ,चाहे जितने कुकर्मी कर्म दूसरों के लिए दुःख दर्द बोने वाले कर्म, दूसरों को अहंकारीय स्वरूप से उत्पन्न होने वाले, दूसरों का बुरा करने वाले कर्म कभी परमेश्वरीय प्रकृतेश्वरीय न्यायी सत्ता में कभी भी क्षम्य नहीं होते हैं। उनके परिणाम अवश्य ही मिलते हैं ,भले ही देर अवेर में । ” या काया से पातक होई । बिन भोगे छूटे नहिं सोई ॥”

” कर्म प्रधान विश्व रचि राखा , जो जसि करई तो तस फल चाखा । । “

जब उस सर्वेश्वर का न्याय होता है। तो उसकी लाठी चलती है। परन्तु उसमें आवाज नहीं निकलती है। निरपराधी को अपराधी मत बनाइये, उस पर अन्याय का कहर बरसाने के अपराधी मत बनिये क्योंकि परमेश्वरीय / प्रकृतेश्वरीय सत्ता के न्याय में क्षमा का कोई स्थान नहीं है। पाखण्डीय प्रपंच कुछ काल तक काया के लिए सुखदायी हो सकते हैं। परन्तु दीर्घकालिक कभी भी नहीं । जैसे पौधा रोपने पर धीरे -धीरे बढ़ता है । इसी तरह बुरे मनोभावीय , पाप आचारीय लोगों द्वारा किये गये अपने ही आत्मिक सदृश भाइयों के प्रति किये गये, किये जाते रहे कुकर्म शनैः शनैः बढ़ते हैं , इकट्ठे होते हैं।  “निरपराधी , दुर्बल , निर्बल , कमजोर , दीन हीन पर अपराध लादोगे तो वह रो देगा । परन्तु जब परमेश्वरीय सत्ता का न्याय बरसेगा तो तुम्हे / हमें जड़ पेड़ से खोदेगा । । ”  इसलिये किसी के जान जीवन से या अन्य गलत रूपों से खिलवाड़ मत करो । होश से रहो , होश से चलो । भला करो भलाई करो । परमेश्वरीय /प्रकृतेश्वरीय सृजनीय सत्ता में ऐसी कोई समुदायी, वर्गीय संरचना युक्त कोई व्यवस्था नहीं है। यह सब समुदायी, वर्गीय व्यवस्था बुद्धिमान मानव , चतुर होशियार मानव द्वारा उसकी चतुराई का सृजन है। सृष्टि पर जन्में विद्वान महामानव जो समुदायी व वर्गीय रूपों स्वरूपों से परे निर्मल, निश्छल बुद्धि विवेकधारी हुए हैं उन्होने अपने पूर्ण परम सत्य अनुभव निश्छलीय , निष्कपटीय , सर्वमंगलीय , सर्वकल्याणीय , सर्वमानव समुदाय को आनंद परक अपने अनुभवीय सर्व सुख शान्ति आनन्द दायक सद् ग्रन्थों के माध्यम से अपनी लेखनी द्वारा व्यक्त किये हैं। ” दुर्बल , कमजोर, सद् जीवन जीने वाले अच्छों को न सताइये । उन्हे वेदना देने की चेष्टा न करो उनकी मोटी हाय । जब परमेश्वरीय सत्ता का न्याय होगा, तो बड़े से बड़ा साम्राज्य ध्वस्त हो जाय। । “ परमेश्वर / प्रकृतेश्वर हम सभी की करनी (कर्म ) पृथ्वी रूप में ,जल रूप में , अन्तरिक्ष रूप में , वायु रूप में, वृक्षों व पौधों के रूप में, सूर्य के प्रकाश के रूप में हम सभी के सुकर्म व कुकर्म देख रहे हैं । इस सत्य को हे मानव ( नर नारी , स्त्री पुरुषों ) जानो व अनुभूत करो । मिलेगा वही जो बोओगे । वह सर्वेश्वर इन्ही अपने प्रकृतिगत स्वरूपों में हम सबका सबकुछ देख रहा है। इस सत्य को जानो । सन्त केवल वह है जो स्वयं त्याग करके दूसरों को सुख पहुंचाता है और असंत वह है जो दूसरों के जीवन के लिए अपने निज सुख स्वार्थ में अन्धा होकर दूसरों के लिए दुःखों को उड़ेलता है। ” सन्त सहैं दुःख परहित लागी । पर दुःख हेतु असन्त अभागी ॥ “ ज्यादातर हर समुदाय के सद्ग्रन्थों में दो ही बातें , दो ही स्वरूप मूल (जड़ ) हैं। “सभी सद् ग्रन्थों में बात मिली हैं दोय । सुख दीन्हे सुख होत है, दुख दीन्हे दुःख होय ॥ “ मानो या न मानो यह सब आज वर्तमान में जो अल्प आयु में मृत्युऐं , व दुःखों का आगम मानव जीवन में दृष्टिगोचर है अथवा हो रहा है जो सर्वत्र समग्र सृष्टिपटल पर त्राहि-त्राहि मची हुई है। एक दूसरे के खून के प्यासे होकर अपनी क्रोधाग्नि धधकाते हुए जान जीवन लेने, हरने का जो रूप आज विश्व में चल रहा है । यह हम सभी की अज्ञानता, अन्धता, अविवेकशीलता का पूर्ण परिचायक है। सम्हलो हे सभी समुदाय के मानवों सम्हलो हे नर नारियों , स्त्री पुरुषों । सद् बुद्धि विवेक सद्ज्ञान प्रकाश से , आत्मवतीय जीवन प्राण चेतना से , परमेश्वरीय / प्रकृतेश्वरीय सत्ता के सत्य नियम नीति अनुसार सत्य प्रेम स्नेह करते , रखते हुए जीवन संचालन करो। तभी सच्ची सुखशान्ति आनन्द मिलेगा । काया से पाप व दोषपूर्ण कर्मों का श्रृजन नहीं होगा तभी ही सच्ची सुख शान्ति आनन्द मिलेगा व पाओगे तथा सच्चे आत्म सन्तोषीय रूप में गोता लगा पाओगे।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री ”

 

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