समान सृष्टि रचयिता के मानव रचना में पारस्परिक छूत अछूत का भेद, पास और दूरी का भेद वर्गीकरण, जातीय स्वरूप का न ही उचित व सत्य प्रतीत होता है और न ही ईश्वर संरचित है और न ही ईश्वर प्रिय है और न ही उसने पारस्परिक दूरी असमानता , घृणात्मक छोटी-बड़ी ऊंच नीच जैसी कोई वर्ण व्यवस्थीय संरचना की है। यदि ऐसी कोई वर्णीय व्यवस्था सर्वोच्च सत्ता परम पिता परम आत्मा, प्रकृति मातृ स्वरूपा की ओर से होती है तो शारीरिकीय, मानसिकीय और इंद्रिय जनित रूपों स्वरूपों की आकृति और जीवन संचालित रूप स्वरूप तथा शारीरिक मानसिक इन्द्रिय जनित क्रियाओं प्रकियाओं की संचालन स्वरूप ही अलग थलग होता शारीरीय आकृति बनावट ही अलग थलग होती । इसलिये यह वर्णगत विकृति भारत में अति दर्दनाक अति विषम, अति दुखदायी अति क्रूरता जनक पारस्परिक स्नेह प्रगाढ़ता में , पारस्परिक प्रेम में, पारस्परिक समान आचार में अति अन्यायी अत्याचारीय स्वरूपीय है। इस असमानता परक वर्ण व्यवस्था से नित्य प्रति मानव द्वारा अपने ही आत्मिक स्वरूप मानव , माताओं , बहिनों , बेटे-बेटियों और भार्याओं के साथ व्यक्ति के अहंकारीय स्वरूप के माध्यम से ऊँच नीचीय वर्ण व्यवस्था का कारण स्वरूप व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति के प्रति राग , द्वेष , घृणा , हत्या , मर्डर , चोरी , डकैती , बलात्कार जैसे अन्यायी अत्याचारीय व्यक्ति के जीवन में पाप आचरणीय प्रवृत्ति प्रकृति का प्रादुर्भाव होता है। इसमें बाल ,युवा , प्रौढ़ ,वृद्ध सभी अति आहत होते हैं, पीड़ित होते हैं पीड़ित रहते हैं। एक पक्ष का वर्चस्व अनाधिकार कृत विषम खाई बनाने / रखने का कारण बनता है , होता है । जो भारत में एक विषम समस्या के रूप में विस्थापित है । सर्व समान सृजन हारा जगद् ईश्वर , जगद् पिता , जगद् माता पृथ्वी तल में विद्यमान अपनी समान संरचना का यह हाल देखकर अपने अन्तः हृदय में अतिवेदना अनुभूति अवश्य करता होगा, कर रहा होगा । कि मैने ऐसी दुर्गतिपूर्ण विडंबना पूर्ण स्वरूप स्थित धरती पर देखने, होने , रहने , रखने हेतु मानवीय संरचना नहीं की थी। परन्तु निज सुख स्वार्थ में डूबे अंधे सबल सशक्त चतुरचालाक अति बुद्धिमान विवेकवान मानव ने मेरी प्रदत्त बुद्धि विवेक ज्ञान प्रकाश की यह दुर्गति की व दी। एसी कल्पना उसने कभी भी नहीं की होगी। अपने सृजन का पारस्परिक हश्र वह ऐसी दशा देखकर कितनी ही हम सभी उसे वेदना दे रहे हैं व देते हैं। शिक्षा अशिक्षा विद्वता अज्ञानता ज्ञानी विज्ञानी अज्ञानी का लघु वर्गीकरण तो हो सकता है कि भाई कोई बहुत पढ़ा लिखा है कि कोई बिल्कुल पढ़ालिखा नहीं है। परन्तु ये मानव मानव एक दूसरे को हीन भावना से असम्मान जनक एक दूसरे को देखने वाला प्राण का नाश करने वाला क्रूरता की हदें लांघने वाला, जीवन का हरण करने वाला पारस्परिक स्वरूप अति अपराधमयी अति अक्षम्य अपराध मयी अति पाप, दोष अन्याय अत्याचार युक्त, छलछद्म झूठ पाखण्ड से ओतप्रोत स्वरूप है। ईश्वरीय नीति रीति दर्शन में सभी के स्वाभिमान समान हैं । फिर अपने स्वाभिमान का बड़ा रूप और अगले दूसरे व्यक्ति के स्वाभिमान का कहीं कोई स्थान नहीं। यह हम सभी की अतिमानसिकीय अहंकार स्वरूपीय गलत स्वरूप के देने प्रदान करने वाली परमात्मा की दृष्टिदर्शन से अति दोषपूर्ण है। तमाम अनेक सद्ग्रन्थों के सत्य तात्पर्य निकालने के दृष्टि दर्शन से इस वर्णव्यवस्था से कितने जीवन नष्ट होते हैं। मात्र अन्यायी अत्याचारीय अहंकारीय स्वरूप से । जबकि अहंकार को ईश्वर सेवा प्रेम पूजा साधना आत्म आराधना परमेश्वर को रिझाने मनाने में अहंकार सबसे बड़ा दुर्गुण युक्त स्वरूप बताया गया है। कहते हैं अहंकार रावण का नहीं रहा जिसने काल को पाटी से बांध रखा था । जिसके यहां वरुण देवता पानी भरते थे अग्निदेव भोज्य पदार्थ और अन्य आवश्यकीय कार्य करते थे । वायु देव झाड़ू लगाते थे । इतना प्रकाण्ड विद्वान बलवान उसे भी वह दिन देखना पड़ा था जब उसके दस सिर धरती पर पड़े थे और बीस भुजायें छिन्न भिन्न रूप में पड़ीं थीं गिद्ध शियार उन्हे नोंच-नोंच कर खा रहे थे । इसी तरह कंस , दुर्योधन, शिशुपाल , जरासंध और इस धरती पर हुए असंख्य बलवान, सबल, सशक्त राजा दुर्गति पूर्ण ढंग से मिट्टी में मिले और निम्न स्तर से झुककर उनका प्राणान्त हुआ । किसी सत्य तत्त वेत्ता ने सच ही कहा है
मानव कभी गर्व न कीजिए काल गहें कर केश ।
ना जाने कित मारसी कि घर कि परदेश । ।
ऊंच और नीच के विस्थापन में गर्व का समावेश है जो किसी के भी लिए अति दोषपूर्ण है, पाप पूर्ण है अंधकार पूर्ण है विनाशपूर्ण है। इसलिए भारत में जातिप्रथा का सम्पूर्णतया अन्त होना चाहिए। व्यक्ति व्यक्ति में पारस्परिक हर स्तर से समानता समान विचारधारा होनी चाहिए ।अपना स्वाभिमान और दूसरों के स्वाभिमान की समानीय रूप से आत्मभाव से पारस्परिक रक्षा होनी चाहिए । भारत विश्वगुरु की स्थितिमें तभी आसकता है । तभी विश्वगुरु के स्वरूप को प्राप्तकर सकता है। यदि यह सामाजिक दोष भारत से नहीं मिटा ? अतः लोगों द्वारा इसका सत्य आकलन करके इस विषम खाई को पाटने में राग द्वेष रहित, अन्याय अत्याचारीय रूप स्वरूप रहित नहीं किया गया एवं जाति प्रथा को ऊंचनीच छूत अछूत , स्पर्श अस्पर्शीय खाई को पूर्ण यथार्थ सत्यता को अपना कर नहीं पाटा तो यह दोष परमात्मीय सर्वेश्वर प्रकृतेश्वरी माता के दृष्टि दर्शन से अक्षम्य होगा तथा भारत में पारस्परिक वह जीवन जो ईश्वरीय प्रदत्त ईश्वर रक्षित है । जहाँ विज्ञानीय बुद्धिमान मानव एक छोटी सी चींटी को न ही बनाने में सक्षम है वहीं उसके द्वारा अपने ही आत्मीय जनों आत्मीय भाइयों के प्राण हरण तथाअपने ही माताओं बहिनों बेटे बेटियों को अनाथ करने व भार्याओं के सुहाग दीपक बुझाने से बड़ा पाप अपराध कोई दूसरा शायद होगा । जिसे जगत पिता जगत माता की नियम नीति में उससे बड़ा मानव जगत में कोई अक्षम्य अपराध दूसरा नहीं होगा । इसलिये हे मानव तुम्हे एसी स्थितियों को जन्म देने का कोई अधिकार नहीं है। जागो और इस अक्षम्य अपराध पूर्ण अति अन्यायपरक विषम स्थिति से अपने को मुक्त करो । इससे अपने को दूर करो , इससे अपने को दूर रखो । तभी ही पूर्ण परम सत्य रूप में प्रकृति स्वरूपा जगद् ईश्वरी जगद् ईश्वर की पूर्णतया कृपा स्नेह के सत् पात्र सिद्ध होवोगे । पूर्णतया कृपा मिलेगी और पाओगे और पूर्ण परम सत्य सुखशान्ति आनन्द से निर्विघ्न निर्विकारीय रूप से जी पाओगे ।
जागो रे जिन जागना अब जागन की बार ।
तब क्या जागे मानवा जब खुद के बढ़ गये पाप हजार ॥
यह जातीय व्यवस्था वर्गीकरण ब्राम्हण , क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र विभिन्न – विभिन्न स्वरूप अर्थात् अलग-अलग स्वरूप प्रदर्शित करता है। जो पारस्परिक असमानता परक भेद प्रदर्शन कारीय है । यह सृष्टि पटल के भारत देश में कलंक का प्रतीक व कलंकीय अभिशाप है। यह जब तक रहेगा ? तब तक एक समान मानव एक नहीं हो पायेगा और आत्मीयता मानवता का विस्थापन नहीं हो पायेगा तथा वर्णगत चार वर्ण स्वरूपों की और हजारों शुद्र वर्णों की खाई कभी नहीं पट पायेगी । यदि धरती पर स्वर्ग बनाना है, धरती पर स्वर्ग को लाना है । मानव मानव एक हो जब सारी मानव संरचना क्रिया कलाप एक ही हैं । इसलिए इस सर्व विनाशी विभीषिका को सच्चे बुद्धिमान सत्व सात्विकीय गुण प्रकृति धारीय सर्वोच्च बुद्धिजीवी मानव विचार करें और पारस्परिक आत्म शोधन करके, इस वर्णगत जातीय व्यवस्था रूपीय अभिशापीय कलंक को मिटायें हटायें तिलांजलि दें व समाप्त करें । सर्वस्वरूपीय पारस्परिक एकात्मता को प्रेम स्नेह आत्मीयता मानवता को ” सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामया, सर्वेभद्राणि पश्यन्ति मां कश्चिद् दुःख भाग भवेत् । ” अर्थात् सभी सुखी हों सभी निरोगी हो किसी को किसी से किसी प्रकार का कहीं कोई अंश मात्र भी कष्ट न हो । सभी एक दूसरे के हित के लिए सोचें । पूर्ण परमसत्य रूप में निष्कपट निश्च्छलीय निष्कामीय निरहंकारीय रूपों स्वरूपों को पारस्परिक प्रतिपादित करें । तभी पूर्णतया ईश्वरीय प्रियता और “आत्मवत् सर्वभूतेषु ” का मंत्र भारत भूमि पर सत्यरूप में उदघोष होगा, गूंजेगा । यह उदघोष गूंज विश्व पटल तक जायेगी और विश्व में विद्यमान देश भी अपनी अपनी अज्ञान जनित विभिषिकओं को जिन्होंने सर्वत्र संघर्षीय त्राहि-त्राहि मचा रखी है। वे भी सत्य बुद्धि विवेक से विचार आत्म चिंतन करते हुए आत्म सुधार के मार्ग की ओर बढ़कर आत्म मंगल का मार्ग खोजेंगे, प्रशस्त् करेंगे और सम्पूर्ण विश्व में प्रेम की स्नेहकी आत्मीयता की मानवता की पारस्परिक मिलने की प्रगाढ़ता बढ़ेगी । और एक सत्य तत्ववेत्ता का यह सत्य सूत्र सिद्धान्त सत्य सिद्ध होगा । हम सुधरेंगे जग सुधरेगा । । ” ना करो किसी का शोषण ना करो किसी पर अत्याचार यही मानव जीवनका सार इसी से ही बनता है पारस्परिक सत्य प्रेम आधार “
क्रमश:
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री “





