सामाजिक जनसमुदाय के प्रति इतनी अन्यायपूर्ण अत्याचारीय जातिगत वर्चस्व, पद प्रतिष्ठागत वर्चस्व का इतना प्रभाव ?
उन्नाव कांड : न्याय व्यवस्था पर सवाल, सत्ता संरक्षित अपराधों की भयावह तस्वीर
रिपोर्ट | विशेष संवाददाता
डा० बनवारीलाल पीपर “शास्त्री”
उन्नाव रेप व मर्डर कांड भारत की न्याय व्यवस्था, पुलिस तंत्र और सत्ता संरक्षित अपराधों पर एक ऐसा गहरा प्रश्नचिह्न बनकर उभरा है, जिसने पूरे देश के जनमानस को झकझोर कर रख दिया है।
यह मामला केवल एक अपराध नहीं, बल्कि जातिगत वर्चस्व, पद-प्रतिष्ठा की हनक और सत्ता के दुरुपयोग की वह भयावह तस्वीर है, जिसमें मानवता, संवेदना और न्याय दम तोड़ते दिखाई देते हैं।
आरोप है कि पीड़िता के साथ घटी वीभत्स घटना के बाद जब वह न्याय की आस में थाने पहुँची, तो पुलिस ने अपने संवैधानिक कर्तव्यों को ताक पर रख दिया। न तो उसकी पीड़ा सुनी गई, न ही रिपोर्ट दर्ज की गई। पीड़िता और उसके परिवार को बार-बार अपमानित कर थाने से भगा दिया गया।
स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि पीड़िता के पिता न्याय की गुहार लेकर गए, लेकिन उन्हें उल्टा झूठे मुकदमे में फँसाकर पुलिस हिरासत में डाल दिया गया, जहाँ उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इसके बाद न्याय के लिए आवाज़ उठाने वाले अधिवक्ता और पारिवारिक संबंधों से जुड़ी मौसी की भी रहस्यमय सड़क दुर्घटना में मौत ने पूरे प्रकरण को और भयावह बना दिया।
यह घटनाक्रम सत्ता-संरक्षित अपराधियों की क्रूरता, दबंगई और सुनियोजित षड्यंत्र की ओर संकेत करता है। सवाल यह है कि क्या न्याय व्यवस्था इतनी दबावग्रस्त हो चुकी है कि वह पीड़ित की चीख तक सुनने में असमर्थ हो जाए?
समाज के बुद्धिजीवियों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि अपराध करने वाले प्रभावशाली हों, तो पीड़ित की अस्मिता, जीवन और न्याय – तीनों को कुचल दिया जाता है। यह स्थिति लोकतंत्र और संविधान की आत्मा पर सीधा प्रहार है।
कबीरदास की पंक्तियाँ आज भी चेतावनी देती हैं—
“दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय।
मरे चाम की धौंकनी, लौह भसम हो जाय॥”
उन्नाव कांड अब केवल एक केस नहीं, बल्कि न्यायिक इतिहास का वह काला अध्याय बन चुका है, जिसने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब सत्ता, पुलिस और अपराधी एक साथ खड़े हो जाएँ, तो आम नागरिक कितना असहाय हो सकता है।
देश की न्यायपालिका, शासन और प्रशासन से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे पद, प्रतिष्ठा और राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय की गरिमा को बचाएँ। अन्यथा न्याय की अवधारणा केवल पुस्तकों और भाषणों तक सिमट कर रह जाएगी।
न्याय पद पर बैठे इसलिए नहीं कि अति अति वीभत्सशा की सीमा को अंधे होकर शासन सत्ता की हनक में अपना सत्य न्यायी कर्तव्य दायित्व बिल्कुल या सत्य भय के मारे या पद प्रतिष्ठा , प्रमोशन लाभ के लिए अथवा धन संपत्ति लोभ के लिए ना भूल जाओ होश में आओ, होश में आओ । उन्नाव रेप कांड , मर्डर कांड एक अन्याय अत्याचार, क्रूरता असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा की हदें लांघने वाला सत्तारूढ़ बाहुबलियों की दबंगई की सीमाएं तोड़ने वाला एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया है। जो भारत के बच्चा- बच्चा के संज्ञान में आ गया है।
” दुर्बल को न सताइये,जाकी मोटी हाय । मरे चाम की धौंकनी लौह भसम हो जाय ॥ “
” कबिरा गर्व न कीजिए, पद प्रतिष्ठा में इतने न भूलिए कि निर्बल दुर्बल गरीब तड़फ जायें । कहां किस दिशा में किस कुगत से किस दशा में प्राण न निकल जायें। “
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”





