परमेश्वरीय भूल भुलैया रूप में दिग्भ्रमित होकर स्वयं को न भटकाओ न भटको। परमेश्वरीय भूल-भुलैया में न उलझें, अपने सत्य कर्तव्यों का निर्वहन ही सच्ची पूजा

रिपोर्ट: डा० बनवारीलाल पीपर “शास्त्री”

झांसी | विशेष लेख
मानव जीवन का मूल उद्देश्य ईश्वर की खोज में भटकना नहीं, बल्कि अपने सत्य कर्तव्य और दायित्वों का पूर्ण ईमानदारी से निर्वहन करना है। यही सर्वोच्च सत्ता प्रकृतेश्वर की मानव जाति से वास्तविक आशा और अपेक्षा है। यह विचार वरिष्ठ चिंतक एवं लेखक डॉ. बनवारीलाल पीपर ‘शास्त्री’ ने अपने विचारोत्तेजक लेख में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि ईश्वर किसी बाह्य पूजा-पाठ, मूर्ति-आराधना या तीर्थ-भ्रमण से प्रसन्न नहीं होता, बल्कि वह मनुष्य से यह अपेक्षा करता है कि वह अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के प्रति अपने दायित्वों का सत्यनिष्ठा से पालन करे।
कर्तव्य-विमुखता ही दुःख का मूल
डॉ. पीपर के अनुसार जब व्यक्ति अपने शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा नैतिक कर्तव्यों से विमुख होता है, तब वही असंतुलन दुःख, कष्ट और पीड़ा का कारण बनता है। चाहे वह व्यक्तिगत हो, पारिवारिक हो या सामाजिक—हर स्तर पर कर्तव्य-भंग का परिणाम अंततः स्वयं को ही भोगना पड़ता है।
प्रकृति ही परमेश्वर का साकार स्वरूप
उन्होंने प्रकृति को ही ईश्वर का वास्तविक स्वरूप बताते हुए कहा कि—
सूर्य तप कर जीवन ऊर्जा देता है
पृथ्वी अन्न, फल और जीवनदायिनी संपदा प्रदान करती है
जल जीवन का पोषण करता है
वायु प्राणों की रक्षा करती है
चन्द्रमा शीतलता और संतुलन देता है
ईश्वर किसी पत्थर की मूर्ति में नहीं, बल्कि कण-कण में व्याप्त जीवन चेतना में विद्यमान है।
सच्ची पूजा क्या है?
लेख में स्पष्ट किया गया कि सच्ची पूजा वही है—
जो श्रम, परिश्रम और कर्तव्य से जुड़ी हो
जो ईमानदारी, पारदर्शिता और करुणा से सम्पन्न हो
जो मानव, पशु-पक्षी और प्रकृति के प्रति संवेदनशील हो
मंदिरों में रोना-गाना, दुखों की फरियाद करना ईश्वर की अपेक्षा नहीं है। वह चाहता है कि मनुष्य अपने कर्म को ही साधना बनाए।
सर्वकल्याण का मार्ग
डॉ. पीपर का कहना है कि यदि मानव प्रकृति के समान त्याग, तप, सेवा और निरंतर कर्मशीलता को अपनाए, तो—
परिवार सुदृढ़ होगा
समाज समृद्ध होगा
राष्ट्र विकसित होगा
और विश्व शांति की ओर अग्रसर होगा
वैदिक संदेश
उन्होंने अपने लेख का समापन वैदिक भावना के साथ किया—
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।”
अर्थात—
सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी मंगल देखें और कोई भी दुःखी न हो।
निष्कर्ष
लेखक ने प्रश्न उठाया कि जब ईश्वर को किसी सेवा या पूजा की आवश्यकता नहीं, तब मनुष्य उसके नाम पर आडंबर क्यों करता है और जीवों को कष्ट क्यों देता है? यही आज की आस्तिकता की सबसे बड़ी विडंबना है।
संदेश स्पष्ट है—
👉 ईश्वर को खोजने नहीं, अपने कर्तव्यों को जीने की आवश्यकता है।

-डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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