12 साल से कोमा में पड़े बेटे को मिली “गरिमामयी विदाई” की इजाजत, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

रिपोर्ट: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक मामला सामने आया है। यहां राजनगर एक्सटेंशन निवासी 32 वर्षीय हरीश राणा, जो पिछले 12 वर्षों से कोमा की स्थिति में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे थे, उन्हें अब “गरिमा के साथ मृत्यु” का अधिकार मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी है।
यह अनुमति हरीश राणा के माता-पिता द्वारा दायर याचिका पर दी गई। अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय से मरीज की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है और चिकित्सा विशेषज्ञों की राय भी यही है कि उनके ठीक होने की संभावना लगभग शून्य है।
12 साल से कोमा में था युवक
हरीश राणा कभी एक होनहार और उज्ज्वल छात्र थे। वह पंजाब विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। वर्ष 2013 में एक हादसे में वह अपने पीजी आवास की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस दुर्घटना में उनके मस्तिष्क को गंभीर चोट लगी, जिसके बाद से वह स्थायी वेजिटेटिव अवस्था (PVS) में चले गए।
इस दौरान उनके चारों अंगों में लकवा हो गया और वह केवल कृत्रिम पोषण (CAN) के सहारे जीवित थे, जो सर्जरी के जरिए लगाए गए PEG ट्यूब से दिया जा रहा था।
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट बनी आधार
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए पहले प्राथमिक मेडिकल बोर्ड और फिर AIIMS दिल्ली के डॉक्टरों का दूसरा मेडिकल बोर्ड गठित किया था। दोनों बोर्डों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा कि मरीज के ठीक होने की संभावना बेहद कम है और दी जा रही चिकित्सा केवल जीवन की जैविक प्रक्रिया को बढ़ा रही है।
रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद अदालत ने इसे “अत्यंत दुखद स्थिति” बताया और कहा कि ऐसे हालात में मरीज को अनावश्यक पीड़ा से मुक्त करना ही उसके हित में है।
पैलिएटिव केयर में होगी प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, हरीश राणा को AIIMS के पैलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती किया जाएगा। वहां चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे जीवनरक्षक प्रणाली और कृत्रिम पोषण बंद किया जाएगा, ताकि उन्हें सम्मानजनक और शांतिपूर्ण विदाई मिल सके।
माता-पिता के साहस की सराहना
अदालत ने अपने फैसले में हरीश के माता-पिता की भावनाओं और त्याग का विशेष उल्लेख किया। न्यायालय ने कहा कि इतने वर्षों तक उन्होंने अपने बेटे की सेवा और देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी।
हरीश के माता-पिता अशोक राणा और निर्मला देवी ने कहा कि यह फैसला उनके लिए बेहद कठिन है, लेकिन बेटे की पीड़ा को देखते हुए उन्हें दिल पर पत्थर रखकर यह निर्णय स्वीकार करना पड़ा।
“गरिमा के साथ मरने का अधिकार”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 2018 के उस ऐतिहासिक निर्णय का भी हवाला दिया, जिसमें “गरिमा के साथ मृत्यु” को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना गया था।
अदालत ने यह भी कहा कि जब प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड किसी मरीज के लाइफ सपोर्ट हटाने की सिफारिश कर दें, तो सामान्य परिस्थितियों में अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती।
सरकार को भी दिया निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि सभी जिलों में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) पंजीकृत डॉक्टरों का एक पैनल तैयार रखें, ताकि ऐसे मामलों में तुरंत मेडिकल बोर्ड गठित किया जा सके।
यह मामला इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले और 2023 के संशोधित दिशानिर्देशों को लागू करते हुए यह पहला प्रमुख निर्णय है, जिसने “गरिमामयी मृत्यु” के अधिकार को व्यवहारिक रूप से लागू किया है।

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