यह अलग बात है ? कि राष्ट्र राजसत्ता तंत्र ही यदि भ्रष्ट्र आचार में आकण्ठ डूबा हो और उपरोक्त सत्य सूत्र लागू ही न करे ? अथवा भारत का जनमानस इसे ग्रहण न करे ?
सूत्र न० 1 ( भारत की जनता के लिए) – माता पिता, भाईबहिन, पति पत्नी, बेटे बेटियां राजकीय सेवा या अन्य पदों पर कार्यरत गृह सदस्य के द्वारा अनैतिक या रिश्वत के रूप में लाई गई अथवा भेंट की गयी कोई भी वस्तु, रुपया-पैसा, गहने कपड़े अथवा खाने पीने वाला कोई भी सामान या मिष्ठान बगैरह आदि का भरपूर विरोध करते हुए उनका इस्तेमाल कतई न करें, न रखें, न लें तथा भरपूर विरोध करें । घर के लोगों के द्वारा इस व्यवहार से उपरोक्त राजकीय सेवा में पदस्थ अथवा राजसत्ता तंत्र में पदस्थ घर का सदस्य मुफ्त में मिलने वाली ऐसी वस्तुओं को लेना स्वयं बंद कर देंगे व कर देना चाहिए।
सूत्र न० 2 ( राष्ट्र राजसत्ता तंत्र व शासन सत्ता तंत्र के लिए ) – उपरोक्त राजकीय सेवा में कार्यरत तथा राजसत्ता तंत्र में कार्यरत पदस्थ व्यक्तियों को भ्रष्ट्र आचार में लिप्त पाये जाने पर एक मौका (चेतावनी ) देकर छोड़ दें । दूसरी बार पकड़े जाने व लिप्त पाये जाने पर तुरन्त सेवा मुक्त कर दें । ऐसे लोगों के लिए न्यायिक व्यवस्था के लिए कोई आश्रय या प्रस्रय नहीं होना चाहिए और ना ही कोई न्यायिक नियम नीति का संरक्षण स्वरूप होना चाहिए और यदि पूर्व काल से है तो उसे पूर्णतया समाप्त कर देना चाहिए तथा राजसत्ता में पदस्थ व्यक्ति की पदस्थता समाप्त कर दें । उनके सेवा काल में मिला वेतन घरेलू खर्च से हिसाब लगाते हुए, बढ़ी हुई समस्त चल-अचल सम्पत्ति जब्त करते हुए राष्ट्रीय कोष में जमा कर दें। क्योंकि वह अनैतिक तरीकों से ही अर्जित की गई राष्ट्र की सम्पत्ति है और वह राष्ट्र निर्माण तथा उसके ही भविष्य के काम आ सके। यह नियम संसद में पारित करके, भारतीय संविधान में जोड़ दिया जाय।
सर्व कल्याणमय समाज निर्माण का स्वप्न द्रष्ट्रा – डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”


