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मेरी बुद्धि विवेक से, मेरे दिल दिमागीय ज्ञान प्रकाश से और आत्म अनुभव व आत्म अनुभूति से सबसे बड़ा भारी पाप और पुण्य , व्यक्ति की सदैव जीवन प्राणान्त तक चैन,सुख, शांति, आत्मिक संतोष खींचने वाला है, मिटाने वाला है व न पाने वाला ही निम्न वर्णित स्वरूप है।

आज ज्यादातर व्यक्ति ( नर-नारी, स्त्री-पुरुष ) निन्यानवे दशमलव निम्यानवे प्रतिशत छल छद्म, झूठ, पाखण्ड, अन्याय, अत्याचार, धोखा, दगा, विश्वास घात करने किसी की भी जीवन लीला समाप्त करने । हत्या , मर्डर ,चोरी , लूट खसोट व्यवसायिक स्तर से, व्यवसायिक स्तर में या सरकारी माध्यम से या राजसत्ता पर आसीन होने रहने बनने पर भी वही हाल उसी की चपेट में चाहे न्याय तंत्र हो या शिक्षा तंत्र या राज तंत्र अथवा स्वास्थ सेवा तंत्र सभी या आदमी का आदमी तंत्र , नाते रिश्तेदारी , घर परिवार तंत्र अथवा समाज तंत्र सब आज बुरी तरह उपरोक्त दुर्गुणों अवगुणों के शिकार हैं तथा भयंकर रूप से ग्रसित हैं। नैतिक पतन, मानवता, आत्मीयता, आत्म प्रेम भावीय आत्म तत्तीय स्नेहिलता सब उपरोक्त रूपों स्वरूपों से मानव मन को आच्छादित किये हुए, अपराध बोधीय सारी असत्यता की ग्रसितता से प्रभावित हैं। नीति नैतिकता भूलकर अनीति अत्याचारीय अन्यायी रूप स्वरूप मानव मन को ( नर-नारी, स्त्री-पुरुष ) उपरोक्त पापीय स्थितियों पर सत्य दम तोड़ रहा है । अनीति विशाल रूप में पराकाष्ठा लांघ रही है। कहीं कोई सत्य आचार या चरित्र नहीं रहा है। माताओं , बहिनों, बेटियों की अस्मत हर पल हर क्षण दांव पर है अथवा दांव पर लगी है। आज अपनी माता , बहिन, बेटी को भी प्रेयसी के रूप में मानव कमीना मन देख रहा है और इन स्थितियों के इन स्वरूपों की घटनाएं भी उजागर हो रही हैं। कहीं कोई गलत असत्य से कहीं कोई परहेज नही है। आदमी इतना गिर गया है कि कहीं कोई किसी का सत्य असत्य, सही-गलत कहने का साहस भी नहीं कर रहा है। अर्थात चारित्रिक पतन, नैतिक पतन, न्यायिक पतन सभी वृहद् अन्यायी अत्याचारी पराकाष्ठा पर प्रवर्त हो रहे हैं। धर्म नाम के कर्मकाण्ड सब अन्यायी अत्याचारीय लूट खसोट व्याभिचार, अनाचार, दुराचार, छल छद्म, झूठ पाखण्ड की भेंट चढ़ रहे हैं। सत्य आचार शून्य और धर्मान्धता, अन्धविश्वासिता का दिखावा , छल छलावा, पाखण्डवाद का बढ़ावा भरपूर है। आज ईश्वरीय सत्य , परमात्मीय सत्य, प्रकृतेश्वरीय सत्य की नियम नीति से अगर कोई सत्य पाप पुण्य है। तो यही सत्याचार विहीन दुर्गुण । व्यक्ति के मन में, नर-नारी , स्त्री-पुरुष के मन में व्याप्त सब सत्य धर्मीय कर्मकाण्ड को लील रहे हैं। कहीं किसी सत्य धर्म का सत्य आचारीय नीति नैतिकता का व्यक्ति के मन में उपरोक्त वर्णित पापीय आचार व्याप्त होने कारण सब धर्म अधर्म एक तराजू पर तुल रहा है। एक ही दृष्टि स्वरूप से । पाखण्डी धूर्त धर्म के ठेकेदार बनकर । मानवों की श्रद्धा, आस्था, धनधान्य , लाज, इज्जत अस्मत चरित्र सब लूट रहे हैं। खाये जा रहे हैं। सारा मानव समाज मात्र मूक दर्शक बनकर देख रहे, लुट रहे और मौका लगा तो सत्य आचार धर्म को धता बता कर स्वयं भी लूट में शामिल हो जाते हैं। हो रहे हैं। इसीलिए सर्वत्र त्राहि-त्राहि की गूंज गूंज रही है। प्रत्येक मानव मन नर-नारी, स्त्री-पुरुष अन्दर ही अन्दर अपने हृदय के भीतर कराह रहा है। इस पापाचारीय आचरण चरित्र के व्याप्त हो जाने व व्याप्त रहने के कारण । हे मानव मनीय आत्मिक भाइयों यदि सत्य सुख , शान्ति, आनंद व पूर्ण परम सत्य आत्म सन्तोष चाहते हो तो अपने जीवन के जन्म लेने के सत्य को यदि सत्य सिद्ध करना चाहते हो ? तो इस नाशवान धन सम्पत्ति, भोग, वैभव ऐश्वर्य के रूपों स्वरूपों को भोगने की लालसा त्यागो, छोड़ो। सत्य बुद्धिमत्ता का सत्य विवेकशीलता को दूरगामीय दृष्टि से बुद्धि से तन मन जीवन की व धनसम्पत्ति और भोग विषयक लालसाओं की भावनाओं से अपने को मुक्त करो तब ही पुण्यमयी जीवन बन पायेगा । यदि इसमें सफल होगये तो इससे बड़ा पुण्य इस नश्वर संसार में कोई भी नहीं है और इन्ही लूट खसोटीय चतुर चालाकीयता, झूठ फरेबीयता के वश में रहे तो पाप आचरणीय जीवन जीने के अलावा कहीं कुछ नहीं है। परमसत्ता सर्वोच्च ईश्वरीय सत्ता मात्र सत्याचार को धारण करने वाले तपधारी से ही प्रसन्न होते हैं। अगर यदि कहीं स्वर्ग और नरक है। तो सत्याचारीय स्वर्गीय भोग सुख शान्ति आनन्द का व आत्म सन्तोष पाने का सत्य उत्तराधिकारी है व होता है व रहता है। अगर पापों से मुक्त होना चाहते हो अपने जीवन के कर्मों में सत्याचार ही धारण करना पुण्य स्वरूप की प्राप्ति कराता है और असत्याचार धर्मान्धता अन्ध विश्वासता सदैव सत्याचार विहीन मानव को पापाचार की ओर ही प्रवृत्त करती है। जागो आंखें खोलो ऐसे कर्मों को छोड़ो जो काला मुंह करे अथवा काला जीवन बनाये और संसारीय सत्ता से लगाकर प्रकृतेश्वरीय सत्ता सर्वोच्च सत्ता के आगे पापीयस्वरूप का बखान स्वयं से उगलवाये स्वयं से करवाये । पाप और पुण्य का सत्य आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। सुधार और बिगाड़ स्वयं के बुद्धिविवेक पर है।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा , जो जस करै सो तस फल चाखा ।

कोऊ न काऊ को सुख दुःख कर दाता । निज कृत कर्म भोग सब भ्राता ॥ “

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री ”

 

 

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