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परमेश्वरीय, परमात्मीय सर्वोच्च सर्वोपरि, निराकार, साकार छवि रूप, रंग स्वरूप मात्र प्रकृति स्वरूपा और उससे प्रत्यक्ष होने का व साश्वत प्रेम स्नेह , दया , कृपा सदैव हर पल हर क्षण होने , रहने, चलने, पाने मिलने का साश्वत सत्य व प्रत्यक्ष प्रमाण का सत्य आचार –

प्रकृतेश्वरीय स्वरूपा के नियम – नीति – विधान अन्तर्गत उससे / उनसे तादात्म्य , सामन्जस करते व रखते हुए चलना व अपने को चलाना। उसका कहीं कोई आकर रूप रंग नहीं है। वह सर्वाकार है , सर्वव्यापी , सर्वत्र व्याप्त है , सर्वव्यापक है। वह कण-कण में विद्यमान है। उससे मिलने जुलने, उससे प्रेम स्नेह बनाने, रखने, जोड़ने का सत्य जरिया है । पूर्णतया सत्य सीधे , सरल , निष्कपट , निष्कामीय , निर्विकारीय ,  निर्लिप्त , निरहंकारियता का मानव द्वारा अपने जीवन आचार में , अपने कर्म आचार में प्रयुक्त करना तथा निसंदेह होकर , रहकर सत्य जीवन आवश्यकीय कार्यव्यवहार , कार्यव्यापार पूर्ण सत्य कर्तव्य दायित्व निर्वाहन पालन एवं पूर्ण लगन , मेहनत , श्रमशीलता , पौरुषता , पुरुषार्थता , सौर्य का सत्य परिचय देते हुए व ” आत्मवत् सर्वभूतेषु “ का सत्य सिद्धान्त पूर्ण रुपेण प्रत्येक को अपने ऊपर लागू रखते हुए , जीवननिर्वहन कर्म करना , कर्मरत होना , कर्म रत रहना तथा सम्पूर्ण शंका सन्देहों से पूर्णतया  निर्मूल रहना व छलद्म , झूठ कपट तथा पाखण्डीय प्रपंचों से व अन्यायी अत्याचारीप , धोखा, दगा, विश्वास घातीय रुप  रंगों से पूर्णतया निर्मूल रहना , अपने को निर्मूल रखना । बस मात्र यही पूर्ण परम सत्य धर्म , परमसत्ताई , परमेश्वरीय , परमात्मीय , प्रकृतेश्वरीय सत्य प्रेम , पूजा, पाठ , जप- तप, साधना-आराधना व ज्ञान विज्ञान का मात्र पूर्ण सत्य आधार है। सत्य आचार है और पूर्ण परमसत्य जन्म जीवन आचार है। जानो मानो और जीवन सम्बन्धी । ईश्वर ,धर्म , अधर्म , सत्य-असत्य, सही गलत भ्रमना से पूर्णतया मुक्त हो जाओगे ।

” ना तीरथ में ना मूरत में , ना काबे कैलाश में ।

मोको कहाँ ढूंढो रे बन्दे , मै तो तेरे पास में ॥

ना मन्दिर में ना मस्जिद में, ना गिरजा में , ना गुरुद्वारा में मैं तो हूँ सर्वव्यापी सृष्टि पटल के जर्रे – जर्रे में, सृष्टि के हर रूप र रंगीय आचार में । खोजी होय तुरत हीं मिल्हों दो पल भर की तलाश में ॥”

मुक्त करलो अपने को लाखों भ्रमनाओं से , घटनाओं से , सम्पूर्ण दुःखों से , कष्टों से परेशानियों से , रोग दोष बीमारियों से , मनोमानसिक अज्ञान मयी कुबुद्धिताओं से बच जाओगे व मुक्त हो जाओगे । सर्वोपरीय सत्य आनन्दीय सर्व परिवारीय सत्यानंदमयी जीवन बिताओगे और भव सागरीय भूल भुलैया में, भटकैया से पूर्ण मुक्त हो जाओगे । ।

” ना वह रीझे जप तप कीन्हे ना आतम के जारे , ना वह रीझे धोती टांगे ना काया के पाखारे , दया करे सत्य आचार मन राखे , हृदय रहे उदासी अपना सा दुःख सबका जाने ताह मिले अविनाशी । “

– सृष्टि में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे ईश्वर ने बनाकर छोड़ दिया हो । इसलिये आध्यात्मिकता का लक्ष्य संसार से दूर किसी स्वर्ग को प्राप्त करना नहीं बल्कि यह देखना है स्वर्ग की सम्भावना प्रत्येक मानव के जीवन कर्म आचार में पृथ्वी पर ही है।

ईश्वर तो जीवन की हर धड़कन में मौजूद है । – महर्षि अरविन्द घोष

यदि हम खुद को दैनिक जीवन की झंझटों और दुखों से मुक्त करना चाहते हैं तो हमें अपने विचारों को पवित्र करके मन और हृदय को शुद्ध करना होगा। ज्ञान और सुधार से ही मानसिक शान्ति व परमेश्वरीय सत्ता का प्यार पाया जा सकता है । – सर्वपल्ली डा० राधा कृष्णन्

शुद्ध मन में ईश्वर का वास होता है।

“सांच बराबर तप नहीं झूंठ बराबर पाप , जाके हृदय सांच है ताके हृदय आप ” – श्री रहीम जी

_ डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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