व्यक्तियों द्वारा मन , मस्तिष्क ,दिल दिमागीय अनुभूति परक स्वरूप को त्यागकर आत्मायी सत्यता एवं मानवता का गला घोंटकर आत्मवत् पारस्परिक संवेदनाओं को मारकर क्रूरताओं की हदें पार करके अंधविश्वास का स्वरूप फैलाकर पारस्परिक प्रेम सौहार्द्र की जगह खून की होली खेलने व खिलवाने का सृजन । वाह ! री धर्मान्धता वाह रे ! राजतन्त्र , वाह रे प्रजातन्त्र ? व्यक्ति अपने बुद्धि विवेक में अपनी पूर्ण परमसत्य मनोसोचीय रुप स्वरूप में अपने व्यक्तिगत अनुभव अनुभूति में ताले लगाकर, बुद्धि विवेकीय , चिंतनीय , मंथनीय रुप स्वरूपों को दर्किनार करते हुए, रखते हुए जो व्यक्ति अन्ध प्रथाओं ,अन्ध परम्पराओं को जो ज्यादातर निज सुखस्वार्थ में डूबे , तन मन में भोग ऐश्वर्य वैभवपूर्ण विषय वासनाओं की आपूर्ति की कल्पनाओं में डूबे उन्हे साकार करने हेतु अपनी सत्य बुद्धिविवेक चतुराई चालाकीयता होशियारी का समावेशीय भावनाओं में (छल छद्म , झूठ पाखण्ड , अन्याय अत्याचार , धोखा दगा, विश्वासघात का मिश्रण करके जीवन जीने विषयक छद्म परक संरचना करके अपने छद्ममयी लेखन को अपनी प्रभावी नाम यश कीर्ति व धन वैभवीय सम्पन्नता तथा पद प्रतिष्ठायी मान्यता का अपने नाम का पूर्ण दुरुपयोग करते हुए सद् ग्रन्थों का नाम सद् आचार संहिताओं का नाम देकर अपनी छद्म प्रतिष्ठाओं का दोहन करके, अपना अंधविश्वासीय स्वरूप भरपूर फैलाकर संसार समाज को ऐन केन प्रकारेण , साम – दाम – दण्ड भेद , कूटनीति , कुटिल नीति का नाम देकर सभी का पूर्ण अपनी शक्ति का भरपूर दुरुपयोग करते हुए अंधविश्वास फैलाते हैं और अंधविश्वास को समाज को सत्य विश्वास का रुप देकर स्वयं का सुखशांति , ऐश्वर्यमयी, भोग , सम भोग , आनंदमयी जीवन बनाते हैं और जीते हैं । तथा परमेश्वर का नाम लेकर ईश्वर की इच्छा बताकर संसार समाजीय जनों को षड्यंत्रीय संरचना करके उन्हे पारस्परिक विद्वेषीय भ्रम भवाटकी युक्त आग में झोंक कर अथवा संदेश देकर यही धूर्त अन्यायी अत्याचारी अपने लिए पूर्ण सुख शान्ति की कल्पना में जी ते , हो ते , रहते हुए संसारीय , समाजीय लोगों को, स्वयं सबल सशक्त रहते हुए निर्बल दुर्बल असक्त निर्धन व अज्ञान जनित अंधकारीय अंधविश्वास के शिकार धनवान भी इनके असत्य रूपों स्वरूपों के शिकार होकर इनका ही राग अलापते हैं। यह संसार की जीवन की सबसे बड़ी हृदय विदारक खून की होली खिलवाने वाली मानव विनाश सत्य का सत्य ह्रास करने वाली विडंबना है। हे मानवों जागो ? अपने आत्म अनुभवों से , अपनी आत्मानुभूति परक अपनी पूर्ण परम सत्व गुणीय सात्विकीय प्रकृतीय से अपने परम सत्य को पूर्ण सत्य को स्वयं के ही सत्य बुद्धि विवेक से जो परम सत्ता प्रकृति सत्ता जिसने प्रत्येक जीव प्राणी मानव को एक जैसी पूर्ण परम सत्य बुद्धि विवेकीय ज्ञानी स्वरूप से , शरीर , शारीरेन्द्रियां व जीवन को बनाया है । सृजित किया है। अपने शक्ति , अपने ज्ञान , अपने आत्म , अपनी आत्मा के सत्यानुभवों से अपने को पहिचानों । अपने को जियो अपने को सत्य से चलाओ । सब कुछ ही जो परम सत्य जीवन के लिए प्रत्येक मानव के लिए जो सत्य आवश्यक है वह सब परमपिता परम माता ने प्रत्येक जीव प्राणी मानव ( नरनारी – स्त्री पुरुष ) को प्रदत्त की है उसे ही अपने बुद्धि विवेक आत्मानुभव , आत्मअनुभव, व आत्म अनुभूति से ईश्वरीय सत्ता से सर्वप्रदत्त है। कहीं किसी से भी जीवनपरक जीने का ज्ञान लेने , जाने , पाने की सत्य मायने में कोई आवश्यकता नहीं है। जागो ? अपनी अन्तरआत्मा की आवाज को सुनो और संसारीय समाजीय लोगों के कार्य व्यवहार, कार्यव्यापार के अनुभवों से उनके सही गलत , सत्य असत्य रूपों को अपने ईश्वरीय प्रदत्त बुद्धि विवेक ज्ञान अनुभूति से पहिचानों और उसी से ही अपना अपने परिवार का जीवन संवारो , सुधारो , सम्हालो । यही जीवन का सत्य है। इस जीवन सत्य को सत्य से जियो । सर्व आनन्द , सर्वसुखशान्ति , पूर्ण आवश्यकीय धनधान्य , सम्पन्नता स्वयं प्रत्येक के पास होगी । दूसरों की छलीय छद्मीय, झूठ पाखण्डीय स्वरूपों से ओत प्रोत संरचनाओं से उनके संसर्ग , सानिध्यता की दूरी होने रहने से असत्य से ग्रसित नहीं होवोगे। और परमसत्य मंगलकरणीय जीवन बनेगा, रहेगा , चलेगा और जिओगे । यही सत्य ईश्वर का सत्य जीवन का पूर्ण परम सत्य आनन्द का , पूर्ण परम सत्य आत्म संतोष का पूर्ण मंगलमयी सत्य है। जानो मानों और पालो और सत्य प्रकाशमयी  जीवन बनाओ और जिओ । अंध विश्वास स्वयं से लगाकर परम सत्य सत्येश्वर परमेश्वर की आखों में धूल झोंकने जैसा है । अतः अंधविश्वास को दूसरे लोगों की बातों में न आकर अपने आत्मा के सत्य अन्तःकरणीय उद्गारों को सत्य से सुनने का प्रयत्न करो और उसे पूर्ण परमसत्य रूप में मानो। सत्य का पूर्ण परम सत्य स्वरूप ही स्वयं की आत्मा को जगा सकता है और पूर्ण परमसत्य परमेश्वर तक पहुंचा सकता है। सत्य को सत्य से जिओगे तभी सत्य ( सत्येश्वर , प्रकृतेश्वर ) के सत्य तक पहुंचोगे । अंधविश्वासीय भावना और अंध विश्वासीय साधना या पूजा पाठ या तीर्थ मन्दिर या गीता रामायण का कहीं कोई सत्य औचित्य नहीं है। व्यक्ति का सद् आचार निश्च्छल , निष्कपट , निष्कामीय कोई भी लोभ लालसा से रहित सत्व गुणीय सात्विकीय आचारीय साधना ही मात्र परमेश्वर तक प्रकृतेश्वर तक की सत्यानुभूति करा सकती है। अथवा कराती है। इस सत्य को सत्य से जानों । सोचो ? आंखें बंद करके रख के हम किसी भी जीवन कार्य व्यापार में धोखा खाते हैं । हानि उठाते हैं। फिर इतने बड़े प्रकृतेश्वर सारी सृष्टि के मालिक, सृजनकर्ता , पालनकर्ता , संहारणकर्ता को हम तनमन निर्मल न रख करके कुटिल कूट नीति के सहारे अथवा दूसरों की बुद्धि विवेकीय दिली दिमागीय आश्रृय तले परम सत्ता परमेश्वर जगत पिता जगत माता को क्या पा सकते हैं । सोचो अन्धविश्वासीय अन्धछलांग से जब हम अपना एक अकेला जीवन सत्य रूप से संवार नहीं सकते हैं तो उस सर्वोच्च सत्ता एकेश्वर को कैसे पा सकते हैं। अंधविश्वास से हटो | आत्मा के परम सत्य विश्वास से उसे पाने की लालसा रखो । प्रयत्न करो अवश्य उस सत्य सत्येश्वर को पा जाओगे।

निर्मल जन मन सोई मोहि भावा । मोहि न कपट छल छिद्र दुरावा ॥

ना वह रीझे जपतप कीन्हे ना आतम के जारे । ना वह रीझे धोती टांगे ना काया के पाखारे । दाया करे सत्य मन राखे हृदय रहे उदासी । अपना सा दुख सबका जाने ताहि मिले अविनाशी ।

छोड़ दे छल दम्भ को, झूठ पाखण्ड और घमण्ड को । प्राणियों से प्यार कर , आत्मा का मूल सत्य हृदय से स्वीकार कर । जीवन तेरा सम्हल जायेगा, इस सृष्टि पर जो प्रकृति सत्ता ,सर्वोच्च सत्ता का परमेश्वर का जो परमसत्य सार है , वह सत्य तू पा जायेगा । उस अखिलेश्वर का सार यही है , उस सृष्टेश्वर को पाने का मात्र मूल आधार यही है । I

आत्मीयता , मानवता की पूजा ही , ईश्वर की सत्य पूजा है। जप है, तप है, तीर्थ है , सृष्टि की सभी सरिताओं के संगम का स्नान है। सभी शुभ मुहूर्त हैं। सभी अमृत बेला हैं। जीवन , ईश्वर , परिवार , समाज , राष्ट्र , विश्व के राष्ट्र में विद्यमान सभी के मंगलों का पूर्ण परमसत्य मूल है।

-डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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