परम सत्ता सर्वोच्च सत्ता जगत पिता , जगद्माता को परमसत्य प्रिय हैं।
रिपोर्ट: डा०बनवारीलाल पीपर “शास्त्री”
“निर्मल जन मन सोई मोहि भावा । मोहि कपट न छल छिद्र दुरावा ॥ “
卐परम सत्य मानन करके तो देखो । जीवन , घर , परिवार यदि न बदल जाये । तो कहना ॥ 卐
सर्वोच्च सत्ता परम सत्ता ईश्वर पूजा , आराधना , साधना धर्म का अति सौम्य अतिसरल परम सत्य यथार्थ तात्पर्य एवं परम सत्य रूप व स्वरूप का परम सत्य है
सदाचार अर्थात सभी से जीव-प्राणी-मानव (नर -नारी, स्त्री-पुरुष ) से परम सत्य आत्मीयता ।
बगैर भेद भावीय आत्मवत् परमसत्य प्रेम , स्नेह व स्वयं जैसा मानना व स्वयं जैसा कार्य व्यवहार करना ।
किसी भी अन्य की माता, बहिन, बेटी को अपने ही जैसा मानना, जानना, पहिचानना व उसी तरह का व्यवहार करना।
अपने शरीर जीवन के व्यवहार में , कार्य व्यापार में कहीं कोई झूठ -फरेब, धोखा – दगा, छलछद्म , छल कपट , झूठ पाखण्ड , अन्याय अत्याचार व अहंकार लवलेश मात्र नहीं ।
यह परम सत्य सत्येश्वर , परमईश्वर , सत्य न्यायदाता की रीति नीति के वे सद् आचार हैं जो परम सत्ता सर्वोच्च सत्ता जगत पिता , जगद्माता को परमसत्य प्रिय हैं और उपरोक्त का पूर्ण परमसत्य पालन उनकी दया, कृपा, स्नेह और उनके अथवा उनसे मिलने का परम सत्य आधार है। आचार है।
यदि व्यक्ति ( नर-नारी, स्त्री-पुरुष) इनका पालन ,धारण, मानन नहीं करता है ? तो वह लाख गंगा स्नान करता रहे, लाख तीर्थ गमन, मन्दिर, मस्जिद , चर्च , गुरुद्वारा सेवन करता रहे , रामायण , गीता , भागवद्, कुरान, बाइबिल , गुरुग्रन्थ साहिब का पठन- पाठन,सुनना – सुनाना करता रहे सब पूर्णतया व्यर्थ व निरर्थक है ।
सर्वोच्च सत्ता जगद्पिता परमईश्वर जो चींटी से लगाकर हाथी तक के आहार भोजन की व्यवस्था करने रखने वाला । जो तुम्हारे छलीय -छद्मीय. झूठ – पाखण्डीय , कुटिल -कपटीय ,अन्याय -अत्याचारीय , अहंकारी , विद्वेषीय , छल छलावे में आ जाये यह सोचने का विषय है ? सभी लोगों के लिए ।
वह परम सत्य, यथार्थसत्य , पूर्ण सत्य है । वह मूर्ख अज्ञानी नहीं है हमलोगों जैसा छल फरेबी नहीं है वह सत्य है और उसे सत्य ही चाहिए।
“निर्मल जन मन सोई मोहि भावा । मोहि कपट न छल छिद्र दुरावा ॥ “
“सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप जाके हृदय सांच है ताके हृदय आप ॥ “
“कबीर मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर । पाछे लागे हरि फिरेेेेेेेेे कहे कबीर कबीर ॥ “
■”मोको कहां ढूंढो रे बन्दे मैं तो तेरे पास में ।
■ना तीरथ में न मूरत में न एकांत निवास में । ना मैं मंदिर , ना मैं मस्जिद , ना काबे कैलाश में ।
■ना मैं जप में, ना मैं तप में न वृत उपवास में ।
■ना मैं क्रिया करम में रहता ना सन्यास में ।
■मोको का ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में ।
■न ही प्राण में न ही पिण्ड में न बृह्मांड आकाश में खोजी होये तुरत ही मिलिहों एक पल की तलाश में ।
■कहत कबीर सुनो भई साधो मैं सांसों की सांस में ॥ “
इस धारा को अपनाने वाले सभी दुःख दारिद्रयों से एवं घर परिवारीय, निजजनीय बिघ्न बाधायें, रोग , दोष, बीमारी , भूत प्रेत आदि से यक्ष, गन्धर्वीय अथवा अल्प मृत्यु, आकस्मिक जीवन प्राण हरणीय सारी बाधाओं से एवं संतानें , गलत , अविवेकीय , गलत आचरणीय , गलत चरित्रीय दोषों से पूर्णतया मुक्त रहेंगी ।
सद् आचरण सद्चरित्र धारण करेंगी। सद् बुद्धि विवेकमयी सद् सत्य ज्ञान प्रकाशमयी व धनधान्य से, विद्याधनादि से भरपूर जीवन बनेगा रहेगा व चलेगा ।
कहीं किसी पीर पैगम्बर औलिया , छद्मीय , पाखण्डीय छद्म संत वेषीय या किसी भी ईश्वर नाम का आश्रय लेकर धोखा दगा करने वाले छद्मीय संतों के आगे उनके दर द्वार पर नही झांकना पड़ेगा । न ही किसी पहुंचे या गिरे संत भेष धारण करने वालों के यहां और न ही जादू टोना करने वाले के यहाँ तथा ना ही छूछझ्या करने वाले भगत के यहां ना ही जाना पड़ेगा ना ही भागना पड़ेगा । न किसी से कुछ मांगना पड़ेगा । सत्य आचरणीय लोगों पर परम पिता परम माता पर ईश्वरीय परमेश्वरीय का परम सत्य वरद्हस्त हर पल हर छण सदैव रहता है । बस परम सत्ता , सर्वोच्च सत्ता , परम ईश्वर पर परम सत्य विश्वास करो । परम सत्य पूर्ण सत्य विश्वास रखो और अपनी काया से सुकर्म सत्य भाव व सत्य आचरण चरित्र को परम सत्य रूप में सम्हाल कर रखना है और परम सत्य रूप में जीना है ।
जागो रे जिन जागना अब जागन की बार । तब क्या जागे नानका , तब क्या जागे मानवा जब सोयो पैर पसार ।
अरे मनुष्य तब क्या जागे जब मृत्यु ने आके तुम्हे निगल लिया।
उपरोक्त परम सत्य धारण करके , पालन करके , मानन करके तो देखो । जीवन , घर , परिवार यदि न बदल जाये । तो कहना ॥ –डा०बनवारीलाल पीपर “शास्त्री”





