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 जन्म दाता माता-पिता व गुरू के लिए सदैव कृतज्ञ होते हुए रहते हुए उनकी सच्ची सेवा

जो सन्तान अपने जन्मदाता व जीवन देने, पालने वाले के साथ adjustment, सामंजस्य, समरसता, तालमेल , एकरसता, अनुकूलता, अनुरूपता नहीं कर सकता ? वह समग्र सृष्टि पटल पर कहीं किसी से सत्य वातावरण का स्वरूप ना पा सकता, न बिठा सकता है, न जीवन में आगे बढ़ सकता और ना ही पूर्ण सुख चैन व परम सत्य रूप में ना ही शांति पा सकता ।

जिसे समग्र सृष्टि पटल पर सच्ची आत्मोन्नति, सच्ची आत्मिक सुख शान्ति , आत्मविकास, आत्म आनंद,आत्मसुख पूर्ण परम सत्य रुप में पाना हो तो अपने सर्वप्रथम देवता जन्म दाता माता-पिता व गुरू के लिए सदैव कृतज्ञ होते हुए रहते हुए उनकी सच्ची सेवा सुश्रूषा सर्व प्रथम धर्म कर्तव्य दायित्व मानकर करनी चाहिए।

–  डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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