जिन क्रांति वीरों ने, माताओं, बहनों,बेटियों ने मात्र सत्य जीवन का सत्य, परम सत्ता प्रकृतेश्वरी धरती माता सत्य उसपर रहने विचरने, खाने पीने, आहार भोजन की प्रत्येक को सत्य ढंग से होने मिलने विवस्थित प्रत्येक घर परिवारीय पारस्परिक प्रेम आनंदीय स्वरूप से सभी रहें। और हमारा राष्ट्र ( देश) अन्यायी अत्याचारियों की ग़ुलामी से मुक्त होकर हम सभी देश वासी सत्य जीवन जिये। सभी देश वासियों को जो सदैव सत्य स्वाभिमान से रहने वाले, जीने वाले जीवन चेतना को प्राणों की आहुति का स्वाभिमान रक्षा के कोइ मूल्य न समझने व सत्य वीरों,माताओं, बहनों, बेटियों ने अन्यायी अत्याचारीय हर स्तर से जीवन शोषणीय विवस्था के खिलाफ अपने प्राणों का मोह छोड़कर अपने घर परिवार मां- पिता, बहन- भाइयों का मोह छोड़कर क्रांति का बिगुल बजाया और कूद पड़े। निर्मोही, निर्लोभी होकर सारे भयो से व प्राणों के जाने के भय से भी मुक्त होकर और राष्ट्र माता व् अपने आत्मवत समझने वाले भाइयों के लिए कठोर संघर्ष किया और प्राणों को गंवाया। आज हम जो स्वतंत्र है उन्हीं के प्राणों के बलिदान उनके रक्त की एक एक बूंद के हम सभी ऋणी हैं और जीवन पर्यन्त यह ऋण हम सभी अथवा हमारी संताने जन्म जन्मांतरों तक जन्म लेते रहेंगे, जीते मरते रहेंगे । परन्तु उनके बलिदान का ऋण तथा उनके निज परिवारीय जनों का दुख कष्ट जिनके घर के बेटे बेटियां माताएँ, बहने, भाई तथा पिता आदि चले गए उन परिवारों के दर्द को उन्हीं ने कितनी दुःखद स्थितियों में झेला होगा व झेल रहे हैं। उन क्रांतिवीरों के लिए हम सभी की सच्ची श्रद्धांजलि यह होगी। भारत में या अन्य विश्व के देशों को गुलामी की जंजीरों से मुक्त होकर जिन्होंने स्वतंत्रता पायी है उन सब से मेरा सत्य निवेदन है कि वे क्रांतिवीरों की मनोसोचीय मानव समुदाय के लिए उनके सुख शांति आनंद पाने, रहने के लिए उन्होंने जो कल्पना पूर्ण सपने सोचे थे , बुने थे । उन्हीं को सत्य आत्म सात करके। हम सभी मानव पारस्परिक कूट नीति, कुटिल नीति, कपट नीति, छल छद्म, झूठ पाखंडीय रूप स्वरूपीय धोखा बाजी , दगा बाजी विश्वास घातीय बेईमानी पूर्ण अन्यायी अत्याचारीय रूपों स्वरूपों को त्याग कर चाहे राज सत्ता हो या शासन सत्ता , अथवा न्याय तंत्र , शिक्षा तंत्र , स्वास्थ्य सेवा तंत्र या अन्य जो भी विभाग मानव कल्याण के लिए बनाए गये पारस्परिक सुख शांति, आनंद के लिए बनाए गये उनपर बैठे कार्य कर रहे हमारे आत्मिक भाई ” आत्मवत सर्वभूतेषु” का मंत्र वेद पुराणों , सद ग्रंथों सद साहित्य के रचना कारों ने जो दिया है । सर्व मानव कल्याणीय किन्हीं भी भेद भावों से रहित इसी से ही आत्म सात करे अथवा हृदयंगम करके जहाँ जो जिस स्थिति में जिस पद पर तथा जीवन कार्य व्यापार, जीवन कार्य व्यवहार जिसमें पूर्ण परम सत्य निष्कपट अभेदीय सर्व प्रेम का , सत्य प्रेम का निष्कपट समावेश हो ।वह आचार बनाए , अपनाये व चलाये । यही उन क्रांतिवीरों के लिए पूर्ण सत्य, परम सत्य सच्ची श्रद्धांजलि होगी। और मेरा अब तक के आयु काल में मैने जो देखा है तथा आत्मानुभूति की है। यही राष्ट्र प्रेम होगा देश प्रेम होगा, विश्वामानव प्रेम होगा। यह भाव विचार यदि पूर्ण सत्य रूप में प्रत्येक मन में यदि उदय हो गये तो देश शांति, घर घर शांति, विश्व शांति और उन क्रांतिवीरों की आत्माओं को वे जहां होंगे। सत्य आत्मा शांती, आत्म शांती अनुभूत ( महसूस) करेंगे । यही देश पूजा है। तथा मानव जगत के सत्य कर्तव्य दायित्व निर्वाहन प्रत्येक के प्रति होना, रहना, चलना ही सत्य परमेश्वरी प्राकृतेश्वरीय ईश्वर के प्रति सच्ची पूजा होगी और सदैव रहेगी। इसके साथ ही मैं उन क्रांतिवीरों को अंतःकरणीय भाव से सदैव कृतज्ञता पूर्ण सत्य विचार से आत्मप्रेम प्रसून अर्पित करता हु और उन्हें कोटी-कोटी नमन करता हु। जो आज भी सरहदों व सीमा पर जान हथेली पर रख कर सेवा कर रहे हैं व सेवा कर आये है। उन सभी देश सेवा के सैनिकों को भी कोटि- कोटि प्रणाम, कोटि – कोटि नमन । इस लेख का पालन अनुसरण आत्मिक बन्धु आत्मवत मानव ( नर – नारी, स्त्री – पुरुष) यदि सच्चे रूप रंग, भाव विचार से करते है। तो उससे भी पूर्ण सत्य शान्ति मिलेगी और उसका जीवन सदैव आनन्द पूर्ण उत्साह से भरा हुआ जीवन पर्यन्त रहेगा।
डा0 बनवारीलाल पीपर”शास्त्री”



