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1. उस हर व्यक्ति के लिए सदैव जबतक तन में प्राण हैं। सदैव उसके प्रति कृतज्ञ रहो। जो तुम्हारे सत्य सुख शांति आनंद का व आत्म संतोष पाने का पूर्ण व मूल सत्य आधार है।

2. तुम जहां भी हो। जिस कार्य व्यापार, नौकरी शासकीय या अन्य महत्वपूर्ण कार्य स्वरूपों में तुम कार्य कर रहे हो। वहाँ पूर्ण परम सत्य बग़ैर कोई लोभ लालच लालशा व कोई भी अपने तन मन की आशा , अपेक्षा न रखते हुए अपना सत्य कर्तव्य दायित्व पूर्ण सत्य पारदर्शिता पूर्ण ईमानदारी से निभाओ व करो।

3. ईश्वरी, परमेश्वरी, प्रकृतेश्वरी भ्रांति यदि तुम कहीं पर जहां हो, घर परिवार में संसार समाज में अदृश्य सत्ता (ईश्वर) जो सभी पर दयालू कृपालु है। उसे किन्हीं भी कर्म कांडों से, पूजा पाठ से प्रभावित नहीं कर सकते जबतक तुम अपना कर्तव्य दायित्व जो तुम्हारे पास है या तुम्हे सौंपा गया है। उसका पूर्ण परम सत्य ईमानदारी से यदि तुम निर्वहन नहीं करते हो।

4. छल छद्म झूठ पाखंड धोखा दगा, विश्वास घात ,अन्याय अत्याचार। ये परमेश्वरीय परम सत्ता के नियम नीति में पाप मयी दोष हैं। ये पाप मयी दोषपूर्ण परिधि में आते हैं। यदि व्यक्ति ( नर नारी, स्त्री पुरुष) इनमें रत रहते हैं। तो अच्छा व सच्चा जीवन न उनका रहता है, न ही परिवार और संतानों का। ऐसे लोग कभी भी सच्ची सुख शांति आनंद व आत्म संतोष कभी नहीं पा सकते और न ही उन्हें परमात्मीय सत्ताई दृष्टिकोण से न ही मिलता है न ही पाते हैं। बस उपरोक्त इस सत्य का पालन मानन ही पूर्ण परम सत्य आनन्द सुख शांति और पूर्ण परम सत्य आत्म संतोष का मूल आधार है।

आज पंद्रह अगस्त इस आजादी के महा पर्व पर प्राणों की आहुति देने वाले क्रांति वीरों को भाव भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। तथा वर्तमान में सरहद पर सीमा में जान हथेली पर लेकर देश रक्षा का व्रत पालने वाले सरहद पर जमे सैनिकों व सीमा पर सैनिक सेवा करके आए हुए सेवा निवृत्त वीरों को कोटि कोटि नमन कोटि कोटि प्रणाम।                      

डाo बनवारीलाल पीपर “शास्त्री”


 


 

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