1 . वाह री राजनीति, हाय री राजनीति – राजनीति बहुत खराब है। यह छल छद्म, झूठ , पाखण्ड, अन्याय, अत्याचार, धोखा दगा, विश्वासघात, हत्या व मर्डर की स्थितियां तथा सामर्थ्य वान बनने पर कुटिल कपटपूर्ण , नीति का आश्रय लेकर मानव जाति का स्वाभिमान, गौरव गरिमा का हरण करने वाली व धनदौलत के लोभ लाभ में अपने सत्य आचार को भी गिरवी रखने वाली व बेच देने वाली है। आज भारत की राजनीति का यही हश्र है। आज भारत की राजनीति पूर्णतया इसी रंग रूप की शिकार है। भारत के जनमानस के आर्थिक सुदृढ़ता व भूखे नंगेपन की रहने की कहीं कोई सत्य चिंता सत्य चिंतन का कहीं कोई सत्य राजनीतिज्ञों के हृदय मन मस्तिष्क में कहीं कोई सत्य विचार नहीं ।
2. छल छद्मीय युक्त विद्वता,विद्वान अथवा शिक्षित – धनसम्पत्ति, भोग , वैभव, ऐश्वर्य, लोभ लाभ , लालसाओं से ओत प्रोत इच्छाओं के लालसावान पढ़े लिखे विद्वानों ने भी ग्रन्थों के माध्यम से अपनी लेखनी द्वारा दिग्भ्रमितीय स्वरूप, हेराफेरी करते हुए तमाम सत्य तथ्यों को असत्य का भ्रमित रूप प्रस्तुत करके ग्रन्थों को निर्मित किया । जिनमें असत्य का समावेश है। उन्हें तथा इतिहास तक झूठ फरेब, छल छद्म का सहारा लिया व मानव जाति को सदैव भ्रमित रहने, भ्रमित करने, सदैव आदि काल से आज तक भ्रमित रखने के लिए किया है व कराया जा रहा है। लोग शिक्षित ना हों । राज सत्ताई ताकत का दुरुपयोग करते हुए निरन्तर षड्यंत्रीय स्वरूप बनाये जा रहे हैं। रचे जा रहे है। ताकि इन पढ़े लिखे लोगों की लोभी, लालची, धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्यमयी, भोगमयी जीवन लालसा अवाध गति से चलता रहे। आज भी वही छल ,छद्म , झूठ , पाखण्ड , विश्वास घात , हत्या व मर्डर की मुहिम चल रही है , चलायी जा रही है। जिससे मनुष्य न पढ़ लिख सके । न सत्य का सत्य ज्ञान हो सके और ना ही सत्य प्रकृतेश्वरीय सत्य परमेश्वरीय का सत्य ज्ञान ना पा सके और मेरा छल , छद्म , झूठ , पाखण्ड , अन्याय , अत्याचार का रूप रंग सदैव चलता रहे । फलता फूलता रहे तथा अज्ञान के अन्धकार में डूबी जनता, भारत का जनमानस मेरी असत्य गतिविधियों का निरन्तर सदैव शिकार होता रहे। मेरी कुटिल कपटपूर्ण छल छद्म से ओत प्रोत राजनीति , कूटनीति चलती व फलती फूलती रहे। इस सत्य को जानों मेरे प्रिय आत्मवत् साथियों भारत के लोगों ।
3. मानवता , आत्मीयता , आत्मवत् सत्य धर्म पूर्ण परमसत्य पारस्परिक प्रेम का आगाज – हमें न कोई आदि काल का प्राचीन धर्म , हिन्दू धर्म , मुस्लिम धर्म , सिखधर्म, ईसाई धर्म और न ही विभिन्न – विभिन्न समुदायों के रूप में बढ़े , बढ़ाये पनपाये गये धर्म अपनी – अपनी ढपली अपने – अपने राग वाले पारस्परिक खूनी संघर्ष कराने वाले , खून की होली खिलाने वाले धर्म नहीं चाहिए । हमें मानव धर्म , हमें मानवता धर्म , हमें पारिस्परिक प्रेममयी आत्मवत् आत्मीयता धर्म , इंसानियत की धारा बहाने वाला । इंसानियत का साम्राज्य विश्व में विस्थापित करने वाला जिसमें पारस्परिक प्रेम का उद्भव हो जो सर्वत्र प्रेम सरितामयी धारा के रूप में बहता रहे वह धर्म चाहिए । जिसमें प्रत्येक मानव (नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) , बाल गोपाल , युवा एवं मातायें , बहिनें , बेटियां सभी के तन-मन-जीवन की स्वाभिमान की रक्षा हो , गौरव गरिमा की रक्षा हो , प्रत्येक जीवन शरीर की एक समान , एक रूप स्वरूप में रक्षा हो। ऐसा एक रूप स्वरूपीय धर्म समग्र सृष्टि पर कायम होना चाहिए । अतः मेरे प्रिय आत्मीय भाइयों , माताओं , बहिनों , बेटियों , युवाओं । यदि सदैव ताजीवन दुःख, हृदय विदारक वेदनाओं से बचना चाहते हो , मुक्त होना व मुक्त रहना चाहते हो । तो ऐसे उपरोक्त वर्णित धर्म की स्थापना उसे विस्थापित करने के लिए सर्वमानव एक मानसिकता बनाओ , जोड़ो , जुड़जाओ , एक रूप रंग हो जाओ । बस फिर कभी कोई ऐसा विष बमन कारक दुःख , कष्ट जीवन के अन्त तक नहीं आयेगा , ना ही जीवन के अन्त तक दु:ख पाओगे । आनन्दमयी जीवन बनेगा , रहेगा , चलेगा । बस इस सत्य को अपनाओ ।
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”





