⇒ परमात्मा अंशी आत्मा के अंतः करणीय आवाज में सुनाई देने वाले स्वर ही जीवन के सत्य के लिए दिग्दर्शन, डायरेक्शन ही “वह परम सत्य है।” जिसके लिए मनुष्य यहां वहां तीर्थों, प्रवचनों में खोज रहा, ढूंढ़ रहा, भटक रहा व बेचैन है।

  • जानें ?

रिपोर्ट:  डाॅ• बनवारी लाल शास्त्री 

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प्रत्येक व्यक्ति (नर – नारी, स्त्री – पुरुष) को अपनी आत्मा की आवाज को जो परमेश्वर का व्यक्ति को सद्जीवन, परम सत्य जीवन, परम आनंदमयी जीवन जीने, संचालन करने हेतु परमात्मा प्रदत्त अपने अंश के रूप में मानव शरीर को प्रदान किया गया परम सत्य ज्ञान प्रकाश मयी अनमोल उपहार है ।

व्यक्ति को कहीं कोई किसी भी दूसरे से प्रथम गुरु सीख दाता माता पिता को छोड़ कर कहीं ज्ञान व सीख किसी भी रूप की चाहे वह संसारीय हो, समाजीय हो, ईश्वरीय हो। कहीं किसी से लेने जानें की कहीं कोई अंश मात्र भी आवश्यकता नहीं है। जो लोग दूसरों से कोई भी ज्ञान दर्शन सीख लेने के चक्कर में अपने मूल परम सत्य कर्तव्य दायित्व छोड़ कर जप में तप में तीरथ-मूरत में भागे फिरते हैं, मारे-मारे फिरते हैं वह सब भ्रम में रखने, डालने भटकाोने वाले, भटकने वाले सिर्फ-सिर्फ स्वरूप हैं। परम ईश्वर सर्व प्रथम तुम्हारे ही शरीर में आत्मा अंश स्वरूप में विद्यमान है फिर परम सत्य का आगाज तुम कहीं कोई भी कार्य जीवन सत्य सम्बन्धी करने को उद्धत हो रहे हो, चिंतन-मनन कर रहे हो, सोच रहे हो उसका परम सत्य सही व गलत स्वरूप सर्व प्रथम व्यक्ति की आत्मा अंतःकरणीय स्वर के रूप में तुम्हारे समक्ष व्यक्त करती है अर्थात प्रस्तुत करती है। परंतु सत्य असत्य हर विषय पर जाने वाला, चलने वाला, दौड़ने वाला बहु विषयों में चाहे वह अच्छे हों या बुरे हों रुचि लेने वाला चंचल मन जो सदैव पंच विकारों (काम, क्रोध, लोभ,मोह,अहंकार)  से ओतप्रोत रहता है अपनी आवाज लगाकर अपने स्वरों के भाव देकर व्यक्ति असत‌्‌, असत्य के मार्ग पर ले जाकर पथ भ्रष्ट करने को तत्पर रहता है अतः व्यक्ति आत्मा के परम दर्शन ज्ञान देने वाले स्वरों को न सुनकर न कान न ध्यान देकर भटकाव के मार्ग की ओर परम सत्य से विरत होकर बढ़ने लगता है, बढ़ जाता है बस आत्मा की अनसुनी, अनदेखी और मन की सुनने मानने वाला स्वरूप उसे दूसरों का सहारा, दूसरों का आसरा, दूसरों से अपने सही जीवन संचालन का मार्ग ढूंढ़ने पूंछने हेतु अपनी परम सत्य बुद्धि खोकर दूसरों के आश्रय तले दूसरों के तलवे चाटने हेतु भटकने लगता है ? बस यहीं से व्यक्ति का मार्ग हर तरह के शोषणीय स्वरूप का शिकार बनना, होना शुरू होता है और व्यक्ति अपने में स्वयं विधमान परम सत्य ज्ञान प्रकाशीय ईश्वर अंश आत्मा का परम सत्य त्याग कर दिग भ्रमित स्वरूप धारण कर कमीनें चंचल मन की भ्रम भवाटकी में भटकने लगता है और तमाम अज्ञात दुःख कष्टों का सिलसिला उनका आगम शुरू होने की भटकन भटकाव की पृष्ठभूमि सृजित होने लगती है । यह सब आत्मा की नहीं सुनना व सही गलत का विचार न करने वाले मन के अधीन होने का परिणाम है जो परम सत्य यथार्थ छोड़कर स्वयं से संकटों को न्योता देकर बुलाने जैसा कार्य है। परम सत्य तत्व वेत्ताओं की इन वाणींओ में परम सत्य व्यक्त है – मोको कहां ढूंढों रे बन्दे मै तो तेरे पास में।। “पानी में मीन प्यासी, मोहे लख-लख आवे हंसी।।” दुनिया एसी बावरी पाथर पूजन जाय, घर की चकिया को ऊ न पूजे जेहि को पीसो खाय।। ” न वह रीझे जप-तप कीन्हे, न आतम के जारे, न वह रीझे धोती टांगें न काया के पाखारे, दाया करे धर्म मन राखे हृदय रहे उदासी,अपना सा दुःख सबका जाने ताहि मिले अविनाशी।।” जो व्यक्ति आत्मा की आवाज , स्वरों को सुनता है वही इन उपरोक्त परम सत्य शब्दों का परम सत्य तात्पर्य जान पाता है और इनको परम सत्य आत्मसात करके परम सत्य आनंदमयी जीवन जीता है वह परम सत्य (ईश्वर) को पाता है। व्यक्ति को कहीं ज्ञान सीख लेने के लिए यहां वहां दूसरों के पास आने जाने की कहीं कोई आवश्यकता अंश मात्र भी नहीं है। वह परम सत्य कर्तव्य दायित्व पूर्ण परम सत्य ईमानदारी से सर्व प्रथम घर-परिवार , समाज जन, संसार जन की मंगल कामना सर्व हित भाव रखते हुए परमईश्वर से करते हुए सबके प्रति

“आत्मवत सर्वभूतेषु” भाव से जीवन कर्म संचालित करना चाहिए ।

संसार, जीवन, ईश्वर के खेल का सत्य व असत्य –

संसार में निर्लिप्त, निष्कामी, निर्विकार, निष्कपट होकर परमेश्वर का संपूर्ण विश्वास रखते हुए समग्र सृष्टि पटल के जीव प्राणी मानवों को सुख शांति आनंद दो व उनसे सुख शांति आनंद लो। सभी से हर तरह की आवश्यकीय सेवा ले सकते हो व दे सकते हो। यही परमेश्वर का सर्वहितीय समाज की सत्य सेवा स्वरूपीय परम सत्य आचार है और जीव प्राणीं मानव (नर-नारी, स्त्री,पुरुष) के साथ छल, छद्म, झूठ-पाखंड, धोखा-दगा, अन्याय-अत्याचार तथा शारीरिक मानसिक शोषण किसी भी रूप का किसी भी दूसरे को दुःख कष्ट देते हुए करना विश्वास घातीय स्वरूप है अतः उपरोक्त सभी कृत्य असत्य पापमयी श्रेणी के स्वरूप है। बस यही संसार, जीवन, ईश्वरीय सत्य असत्य का संपूर्ण स्वरूप है। समझो, जानो। आत्मा की सुनकर मानकर चलोगे तो आनंदमयी सुखमयी जीवन पाओगे, बिताओगे। मन की मानोगे दुःख कष्ट जीवन भर पाओगे तथा आत्म अशांत होकर मरोगे व मारे जाओगे। आत्मा परमात्मा का अंश है इसलिए सुख शांति व परम सत्य आनंद दायी है और मन चहूंओर दौड़ने वाला पंचविकारो (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) में रत रहने वाला इसलिए दुःख, कष्ट व अशांतदायी है आत्मा का मार्ग दर्शन ही व्यक्ति के लिए सर्वोपरि सर्वोच्च परम सत्य कल्याणमयी परम मंगल कारी है यही परम व पूर्ण सत्य है।

डा० बनवारीलाल पीपर ‘शास्त्री’

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