धूर्त पाखण्डियों के साथ , झूठ फरेबीय संरचनाकारों, प्रवचनकारों, रचनाकारों के साथ इस सृष्टि धरातल पर परमेश्वरीय प्रकृतिस्वरूपा पितृ मातृ सत्ता ने अपनी रचना में जैसे जन्म , जीवन , मृत्यु , दिन , रात्रि , प्रकाश ,अंधकार का सृष्टि पटल पर उनका अस्तित्व है उसी तरह छद्म मानव , छलीय मानव , अत्याचारीय मानव के मनमानीय ( जो सत्य , असत्य , अन्याय अत्याचार के रूप स्वरूप का भाव विचार जिनके तनमन में नहीं आता है, नहीं होता है ) तामसीय व राजसीय व्यक्ति के साथ परम सत्ता ने सत्व गुणीय , सत्व सात्विकीय प्रकृतिधारी मानव को सृष्टि पर उतारा है। आत्म भाव सर्वत्र सर्व सृष्टि जीव, प्राणी मानव के प्रति रखने वाले ” आत्मवत् सर्वभूतेषु “ सद् सत् सत्य वाक्य का आत्मसात करने वाले करुणामयी , दया , प्रेम , स्नेह , त्याग तपश्चर्या की प्रति मूर्ति का इस सृष्टि धरातल पर सृजन हुआ है अथवा प्रादुर्भाव हुआ है। उन्होने सर्व कल्याणीय सर्व परमसत्य मंगल करणीय दृष्टि से भाव विचार से सर्व कल्याणीय सद् साहित्य सदग्रन्थों का स्वरूप देकर उन्हे लेखनी के रूप में अपने सत्य जीवन जीने की विधा पर आत्म अनुभव व आत्म अनुभूति द्वारा सद् जीवन सत् जीवन सत्य जीवन जीने व पूर्ण परम सत्य आनंदमयी जीवन बनाने सृष्टि धरातल पर मानव स्वरूप में ( नर नारी , स्त्री पुरुष रूप में) सत्य सद् सत् जीवन संचालन ( तन , मन , इन्द्रियों का योग ,भोग , सम भोग , जीवन कार्य व्यवहार , जीवन कार्य व्यापार ) सत्य रूप में निष्पापीय, निष्कलंकीय, अपराध , अन्याय , अत्याचार से अलग हटकर सभी को पूर्ण परम सत्य आत्मवत् मानते हुए सदाचारीय रूप से उनका उपयोग उनका उपभोग करना निष्पापीय अर्थात् सम्पूर्ण पापों से सम्पूर्ण पापमयी दोषों से रहित मुक्त अच्छा व सच्चा परमेश्वरीय नीति नियम विधान अन्तर्गत माना है। वह सत्य आचार धारण करके मनुष्य ( नर नारी , स्त्री पुरुष ) अपना जीवन व शारिरीय कर्मेन्द्रियों , भोगोन्द्रियों का उपयोग व उपभोग में अंश मात्र भी पाप दोष का कहीं कोई अंशमात्र भी सृजन नहीं है। व्यक्ति (नरनारी, स्त्री पुरुष ) अपना जीवन इस ईश्वरीय सत्य महामानवों के सत्य आचारो के निर्देशन में पापमुक्त , पाप दोष रहित निर्मल, निष्कपट , निर्मूल जीवन बना सकता है व जी सकता है। ऐसी सत्व गुणीय सात्विकीय प्रकृतिगत जीवन संचालन क्रिया में कहीं कोई सिरदर्द मानसिक संताप या पापाचार कहीं कुछ भी अंशमात्र भी नहीं है । आत्मायी दिग्दर्शन व आत्मानुभूति आत्मानुभव से निष्पाप निष्कलंक निर्दोष तन, मन, जीवन रहता है होता है । यह उपरोक्त सत्याचार का धारण तन , मन , जीवन में होता है तो व्यक्ति के तन मन बुद्धि विवेक में ज्ञान आचार में सत्य (ईश्वर का) का निवास होने लगता है। जिससे परमेश्वरीय अंश का सद् सत् सत्य डायरेक्शन सत्य रूप में व्यक्ति को मिलने लगता है। और व्यक्ति सदाचारीय , सद् चरित्रीय हो जाता है। जिसमें “सर्व भूते हिते रतः “ में पूर्ण परम सत्य आत्म विश्वास जगता रहता है जागता रहता है। जो परमेश्वरीय सत्यानंद पूर्ण परम आनंद का व्यक्ति उपभोक्ता हो जाता है। अनुभूतिधारी हो जाता है । ऐसा जीवन जो बनाले ,जो जी ले वह पाप दोष मुक्त जीवन है , पाप निर्मूल , निर्दोषीय, आनंदमयी जीवन है। परमेश्वरीय प्रियतामयी जीवन है। पाप दोष से रहित जीवन है। यदि व्यक्ति इस सत्य आचार को धारण करता है , सत्व गुण का पालन करता है तथा सात्विकीय प्रकृति प्रवृत्ति पूर्ण अपनाते हुए जीवन संचालन करता है तो उसे कहीं कोई मंदिर , मस्जिद , चर्च , गुरुद्वारा , तीर्थ स्नान आदि की ,तप त्याग की, जप तप की कहीं कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वरीय प्रकृति सत्ता व्यक्ति के कर्म आचार में , पारस्परिक कर्म व्यवहार में , कर्म व्यापार में यदि वह तामसी राजसी स्वरूप से भोग वैभव ऐश्वर्य के लिए , धन धान्य सम्पत्ति के लिए, पद प्रतिष्ठा यश मान कीर्ति के लिए , छल छद्म झूठ पाखण्ड अन्याय अत्याचार धोखा दगा विश्वासघात साम , दाम , दण्ड, भेद ,कूटनीति , कुटिल नीति कोई भी व्यक्ति यदि अपनी जीवन कार्य शैली में नहीं अपनाता है तथा सम्पूर्णतया अहंकार रहित होता है वही व्यक्ति पूर्ण परमसत्य परमेश्वरीय सत्य नियम नीति अंतर्गत निष्पाप निष्कलंक निर्दोष पूर्ण निर्मल स्वरूप परमेश्वरीय प्रिय सत्य आचारीय है ।
” निर्मल जन मन सोई मोहि भावा, मोहि न कपट छल छिद्र दुरावा ॥ सन्त सहैं दुःख पर हित लागी, पर दुःख हेतु असन्त अभागी । । कबीर मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर , पाछे लागे हरि फिरें कहें कबीर कबीर । । “
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री “





