अब मनुष्य (नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) के जीवन का क्या होगा अंजाम, बचा ले ऐ मौला ऐ राम ।
रिपोँट : डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”
हे जीवनसाथी बनाने, ढूढ़ने वाले युवा बेटे बेटियों और उनके मातापिताओं इस खोज में उतावलापन, अधैर्यपन बिल्कुल मत दिखाना । सम्पूर्ण अच्छी तरह जांच पड़ताल, गहन पूंछताछ आस पास से , गली मुहल्ले से, नाते रिश्तेदारों से बहुत अच्छी तरह करने के बाद ही बेटे बेटियों के सम्बन्ध करने में कदम उठाना, कदम बढ़ाना ।
क्योंकि ज्यादातर हर जगह धोखा- दगा, विश्वासघात , झूठ फरेब व अहंकारीयता रूपी ये दुर्गुण आदमी (नर-नारी, स्त्री-पुरुष ) के मनोमस्तिष्क में विद्यमान है।
इसलिये बहुत सोच समझकर नाते रिश्ते करना चाहिए। पग-पग पर धोखा है ? अब किसका विश्वास किया जाये समझ में नहीं आता ? गलत साथी मिलने पर, गलत सम्बन्ध होने पर सम्पूर्ण गृहस्थीय जीवन माता पिता का अथवा बेटे-बेटियों का सम्पूर्णतया बरबाद हो जाता है। घर परिवारीय जीवन जीने की धारा ही दुःखमयी हो जाती है।
अथवा पूर्णतया बदल जाती है। कलह कलेश घर परिवार के प्रत्येक सदस्य के हृदय में रहने लगता है। दुःख ही दुःख के अलावा सुख शान्ति आनन्द के सत्यदर्शन जीवन के आखिरी सांस निकलने तक भी माता-पिता अथवा बेटे-बेटियों को नहीं मिल पाते हैं , नहीं हो पाते हैं। और दाम्पत्य जीवन यों ही दोनों में से किसी भी एक दूसरे की प्रकृति /प्रवृत्ति असत्य गलत होने कारण अथवा हो जाने कारण ज्यादा कष्ट मयी जीवन जीना व बिताना पड़ता है।
जीवन की सारी हँसी खुशी समाप्त हो ही जाती है एवं सारी खुशी छिन जाती है। साथ में इतनी असह पीड़ा से व्यक्ति व घर परिवार पूर्णतया ताजीवन सदैव व्यथित अन्तः हृदयी वेदनाओं को झेलता हुआ समस्त परिवार ग्राहस्थिक स्वरूप से तहस नहस व सम्पूर्णतया बरबाद हो जाता है ।
इसलिए सम्बन्ध हो न हो। बच्चे आत्म चरित्र सम्हाल कर रखें । होश में रहें और होश से चलें। भले ही ग्राहस्थ्य सुख, शान्ति , आनन्द न मिले । सम्पूर्ण परिवार की जीवनान्त तक जीवन दुर्गति होने से तो अवश्य ही बच जायेगी अथवा बची रहेगी। मेरे प्रिय आत्मिक भाइयों, माताओं, बहिनों, बेटियों , युवा बालकों जीवन सहज नहीं है।
संसार व संसारीय जीवन की कथा व्यथा आत्मिक सुख, आत्मिक दुःख, आत्मिक आनन्द , आत्मिक कष्ट ,आत्मिक शान्ति, आत्मिक अशान्ति , आत्मिक सन्तोष , आत्मिक असंतोष सर्वजनीय सर्वसमक्ष स्वतः ही दृष्टिगोचर है। सर्वत्र दिखाई दे रहा है। सर्वमान्य, सर्वहितकारी रूप रंग दिख रहे हैं। सही व गलत सबतरफ दिखाई दे रहे हैं।
भारत की वह सभ्यता संस्कृति, आदर्श मर्यादा , सब ताक पर रख दिये गये हैं । आज वह समय आ गया है, वह समय चल रहा है ।
अब मनुष्य (नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) के जीवन का क्या होगा अंजाम, बचा ले ऐ मौला ऐ राम ।
पारस्परिक प्रेम दया करुणा स्नेह सेवा पर चलते थे घरबार , अब घर- घर में मचेगा मातम व कोहराम। बचाले ऐ मौला ऐ राम । यही चला यदि ढंग तो होंगे बुरे नतीजे , घर- घर में मचेगा भीषण संग्राम। बचाले ऐ मौला ऐ राम ।
मनुष्य (नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) की फितरत चतुराई चालाकी, धोखा बदमाशी, अब घर-घर में प्रत्येक परिवार में क्या लायेगी अंजाम । बचाले ऐ मौला ऐ राम। अब मनुष्य (नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) के जीवन का क्या होगा परिणाम । बचाले ऐ मौला ऐ राम ॥
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”






