सृजनसत्ता ने जो कर्ता, धर्ता , भर्ता , जीवन चेतना समापन कर्ता है। उसने सबके साथ पूर्ण परम सत्य ( जीव जन्तु, प्राणी ,पशुपक्षी ), मानव ( नर नारी , स्त्री पुरुष ) सबको सत्य प्रेम , स्नेह, दया, करुणा, उदारता, क्षमा, विनम्रता और सत्य न्याय बराबर किया है, रखा है, चलाया है । सभी के लिए पूर्ण सुखशांति आनन्द व आत्म संतोषित होने रहने की पूर्ण परमसत्य व्यवस्था दी है व की है। बुद्धि ,विवेक , ज्ञान प्रकाश सत्य जीवन संचालन कर सभी को बढ़ावा दिया है। सभी की रक्षा, सुरक्षा, आत्म बुद्धिविवेक ज्ञान के प्रकाश से सभी को स्वयं से स्वयंकी रखने करने की दी है । शिक्षा अशिक्षा इसकी भी बहुत सर्वोपरि अन्तः मन मस्तिष्क में सत्य असत्य  को पहिचानने के लिए बहुत ही सर्वोपरि सर्वोच्च महत्वपूर्ण स्वरूप है। जीवन में सुख लाने के लिए व सुख पाने के लिए। सत्य व सुव्यवस्थित जीवन जीने व बनाने के लिए। कुछ ज्यादा बुद्धिमान बुद्धिलगाने वाले ज्यादा विवेकवान शिक्षा दीक्षा पाने वाले चतुर चालाक कुटिल कपटी बदमाश निज सुख स्वार्थ से ओत प्रोत छलियों ने ऐनकेन प्रकारेण अशिक्षित रहने देना। उठने वाले को जान से मारदेना ,मरवा देना व्यक्ति में आत्मसाहस, आत्मबल, शारीरिक, मानसिक शक्तिस्वरूप पैदा न हो । ऐसे षड्यन्त्रों का जाल बुनना , रचना, बनाना, करना, यह बनाया l और अपने ही आत्मिक भाइयों पर , अपने ही आत्मवत् भाइयों माताओं बहिनों बेटियों, गृह लक्ष्मियों ( अपनी पत्नी आदि पर भी) उन पर प्रयोग किया चलाया। अनपढ़ अशिक्षित लोगों को विभिन विभिन्न व्यवसनों को लादने, पालने आदि बनाने का अपनी मनो सोचीय षड्यंत्रीय जाल की चाल अन्तर्गत अभ्यास कराया। मधुरबातों , बाहर मधुर मीठी बातें व भीतर प्राण हनन करने प्राण लेने उनकी मेहनत, मजदूरी  हरने, उनकी चल अचल सम्पत्ति हरने के बड़े- बड़े षड्यंत्र रचे। बुद्धिमान विवेकवान चतुर चालाक बदमाशीय बुद्धिविवेक से शिक्षित होने व रहने से राजसत्ता में पैठ बनाई, पैर जमाए और वहीं अपनी कुटिल कपटी नीति से, राजसत्ता के नाम की आड़ लेकर उन्हीलोगों के लिए जो अशिक्षित हैं , शोषित हैं । हर स्तर से दैहिक, आर्थिक , श्रमिक, श्रम हरण आदि व शिक्षा आदि से दूर रहने दूर करने के नियम विधान नीति बनाकर कानून का रूप दिया कठपुतली लोगों को जो लोभी , कामी , क्रोधी, मोही अपने निज सुख स्वार्थ में अन्धे  मात्र अपने परिवारीय सीमा में रहने वाले और उनकी षड्यंत्रीय नियम नीति संगठन में सपोर्ट करने वाले लोगों की संसद, विधायिका और उच्च पदों उन प्रलोभनीय लालसावान गुलामों को स्थान दिया । जो सत्य असत्य आंख मीचकर अपने बुद्धि विवेक में ताले लगाकर मौन रहते हुए असत्य अन्याय , अत्याचार का सपोर्ट करते रहे और वे लोग उस चतुर चालाकीय छल क्षद्म , झूठ, पाखण्ड , अन्याय , अत्याचारीय संरचना में हाथ मिलाकर, गले लगाकर, दिल दिमाग बुद्धि विवेक में ताले लगाकर अंधे बहरे, गूंगे बनकर षड्यंत्रीय जाल को परिपोषित करते रहे हैं । यह है संसार का, समाज का, मानव समुदाय का, नरनारी , स्त्री पुरुषों को शरीरिक मानसिक नजरिया व कृतित्व । ” कैहि कैहि को समझाऊं सारा जग है अंधा, मात्र पेट भरने के लालच में सुख ,भोग , ऐश्वर्य की कामना में सत्य की अनदेखी कर रहा होकर अंधा ॥ “ यह सब षड्यंत्र करने रखने वाले भी बहुत वीभत्स मौतें मरते हैं। परन्तु संसारीय विषयानुरागीय ऐशपरस्ती के गुलाम होकर भूल जाते हैं ? कि कब कहाँ किस दशा में मौत का सामना करना पड़े। कहीं सिर से आधुनिक वाहन निकल जाते हैं कभी पेट से, कभी पैरों से । परन्तु ऐश परस्ती के इतने आदी हो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं । कि मरना मुझे भी और किस गति से किस दुर्गति से किस दुर्दशा से। कि कम अल्प आयु में या बार्धक्य ( वृद्ध ) आयु में जब शरीर साथ नहीं दे रहा जिंदा लाश बनकर जी रहे होते हैं। ” आगाह अपनी मौत का कोई वशर नहीं। सामान सौ बरस का कल की खबर नहीं ॥ “ आज चहुँ ओर विश्व में क्या भारत , क्या अमेरिका ,क्या रूस, क्या चीन व अन्य दुनिया के देश, छल छद्म झूठ पाखण्ड धोखा दगा, विश्वासघात नीति अनीति कहीं कोई ज्ञान का भान नहीं । सब अपनी अपनी कुबुद्धि युक्त अहंकार के शिकार हैं। नैतिकता ,आत्मीयता, आत्मवतता, मानवीयता , मानवता का चाहे घर घर का आलम हो, गली मोहल्ले, नगर समग्र सृष्टिपटल के जहां मानव खोपड़ी है, सब के सब असत्य के अंधे बनके, बुद्धि विवेकहीनता के अज्ञानता अंधता के शिकार हैं। बाहर मीठी मधुर बात , मीठे। भीतर कटारी छिपाये हुए एक दूसरे के प्रति प्रतिघात करने के लिए। जमीन, जायजाद , धरती, धन, सम्पत्ति, पाने हड़पने के लिए आत्म विनाश, सर्वविनाश करने को तत्पर कुकर्म,अन्याय, अत्याचार , खुद करते हैं और नाम देते हैं कलयुग और कयामत का। इन कुटिल कपटियों छली छद्मियों की नीतियों द्वारा अराजक कुप्रवृत्ति धारी , चतुर ,चालाक, क्रूरता के वाहक। संगठित होकर यह खूनी खेल , सुख शांति चैन खींचने वाला, हरने वाला रच रहे हैं और खेल रहे हैं। मानव , बहिन-बेटियां , माताएं, बाल गोपाल, युवाजन बेमौत अकाल काल कवलित अल्पायु में हो रहे / मर रहे। समस्त जगद् इन निज सुख स्वार्थ में अंधे, डूबे, बड़े- बड़े पदों पर बैठे अहंकारीय गर्व से ओत प्रोत सृष्टिजगत में त्राहि-त्राहि मचाये हुए हैं। चहुँ ओर मानवजीवन का ह्रास हो रहा । वह भी गलत असत्य अमानवीयता के भाव पालने वाले संगठित इन सफेद पोश , अपराधीय तत्व अपने ही जैसे अपने आत्मिक भाइयों से गद्दारी करने वाले। राष्ट्र सत्ता में बैठकर आत्महनन, सर्वहनन , आत्म विनाश , सर्वविनाश की संरचना वाले, विधान नियम नीति आत्मीयता आत्मवतता मानवीयता के विपरीत रचने वाले। यह नहीं जान रहे हैं ? कि राष्ट्र विनाश, विश्वविनाश की भीषण आग उसकी लपटें । सभी को झुलसाएंगीं, सभी को जलायेंगी, सभी को मारेंगी। आदिकाल से आज वर्तमान तक एक से एक तानाशाह हुए ? अपने गर्व अहंकार में अपनी मनमानी चलाई और अंत उनका बड़ी दुर्गति बड़ी कष्टदायी आत्म दुःखदायी विभीषिका के रूप में हुआ । इतिहास साक्षी है छल, छद्म ,झूठ , पाखण्ड , धोखा, दगा, अन्याय, अत्याचारीय रूपों के षड्यंत्रीय जाल संरचना । कारण अपने ऐश्वर्यमयी ‘ भोगीय ,समभोगीय, अंधता में उलझे ,चिपके, लगे रहने कारण इतिहास , देखने , पढ़ने , जानने का समय ही कहाँ है। मेरे इस पूर्ण व परम सत्य सात्विकीय प्रकृतिगत सत्य को समझो। होश सम्हालो ,सत्य होश में आओ और यह खूनी खेल अपने ही द्वारा अपने ही आत्मवत् भाइयों से, माताओं, बहिनों , बेटियों, गृह लक्ष्मियों के जीवन से खेल खेलना खिलवाना बंद करो और परमसत्य होश में आकर परमसत्य आत्मवत् प्रेम करो । कुटिल कपटीय ,छलीय , छद्मीय, झूठ, पाखण्डीय, अन्याय, अत्याचारीय नेटवर्क चलाना बंद कर दो । ईश्वर परम सत्ता की प्रकृति सत्ता (सर्वोच्च सत्ता ) की सच्ची पूजा, सच्ची आराधना, श्रद्धा, आस्था, त्याग , तप , तीर्थ, पुण्यमयी सरिताओं के नाम पर राजनीति , कुटिलनीति , कपटनीति बंद करो। सत्य नीति ,आत्मवत् , आत्म बंधुनीति, आत्म मात्र बहिन बेटी दुःख देने की नीति हटाकर सत्य सुखशांति, आनंद, आत्म संतोषनीति का प्रादुर्भाव करो। मानन करो , पालन करो। सर्व सृष्टि रचियता, प्रकृति स्वरूप ईश सत्ता मात्र इससे ही सत्य प्रसन्न, सत्य खुश होगा और सर्व सुख का विधान तो अपनी प्रकृतिसत्ता स्वरूपा सृष्टि के प्रादुर्भाव काल से आज तक देता ही सदैव दे रहा है व देता आ रहा है । वह सर्व सत्य प्रेम स्नेह आत्मीयता आत्मवतता का ही मात्र सत्य प्रेमी है। इस सत्य को जानो, मानो, अपनाओ और सर्वसुख आत्मसुख की धारा में बहो । ताजीवन स्वयं आनंदित रहो व सकल सृष्टिमानव को आनंदित करो, रखो , बनाओ। परम सत्य सत्येश्वर बस इसी का ही सत्य आकांक्षी व अपेक्षा अपनी सृजनीय रूपों स्वरूपों से करत है व रखता है । आंखें खोलो और बुद्धि विवेक के ताले खोलो असत्य से हटो और सत्य (ईश्वर ) की ओर बढ़ो। ” सत्य बराबर तप नहीं , झूठ बराबर पाप । जाके हृदय सत्य है ताके हृदय आप ॥ ” उसका सत्य व पूर्ण प्रेम उसी के साथ है। नश्वर के पीछे मत पड़ो कोई भरोसा नहीं तन , मन, जीवन, धन , सम्पत्ति, भोग, वैभव, ऐश्वर्य, पद , प्रतिष्ठा , यश, मान, कीर्ति क्षण में नष्ट हो सकते हैं। शाश्वत सत्य जो अभय करता है। जो पूर्ण आत्मसत् आत्माआनंद दाता है तथा आत्मसुख, शान्ति, आनंद, आत्मसंतोष, प्रदाता है उसे ग्रहण करो स्वीकारो अपनाओ और पूर्ण परमसत्य आत्म आनंदमयी जीवन जियो ।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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