तन – मन – इन्द्रियों सद्- असद्, सत् – असत्, सत्य –

■ असत्य आकर्षणों का नाम है जीवन ?

रिपोर्ट: डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री

        卐 मनुष्य तीन गुणों卐

1. सत्व

2. रज

3. तम

व पांच विकारों

1. काम

2. क्रोध

3. लोभ

4. मोह

5. अहंकार

के रूपों स्वरूपों की आकर्षण फांस में तन मन इन्द्रियों की इच्छाओं,आकांक्षाओं के कारण प्रवृत्त होकर बंधता है l

सत्व गुण भाव – विचारोन्मुखी परमात्मा तत्त ईश्वर तत्त , आध्यात्मिक तत्व की ओर अग्रसर होकर भक्ति भाव , ईश्वरीय खोज , सद्‌ आचरणीय रूप स्वरूपों को धरण करके जीवन संचालन करता है। ऐसी प्रकृति प्रवृत्ति से जीवन जीता है। रजगुण भाव विचारोन्मुखी यदि सत्व गुण का थोड़ा भाव अंश उसके पास है तो वह सद् आचार को ग्रहण करते हुये राजसीय रूप स्वरूप , भोग, वैभव , ऐश्वर्य, विशाल साम्राज्य आकांक्षी धनधान्य सम्पत्ति संग्रह आदि में इच्छायें आकाक्षायें रखते हुये जीवन जीता है। जीवन संचालन करता है । तम गुण भाव विचारधारी अगर थोड़ा -थोड़ा सत्व गुण , रजोगुण मिश्रित भावी है तो थोड़ा-थोड़ा सभी गुणों का लक्षण धारण करके ईश्वरोन्मुखी ,राजभोग वैभव ऐश्वर्यीय इच्छाओं को रखता हुआ ज्यादातर असत् , असत्य सुकर्मों को कम व कुकर्मों की और प्रवृत होकर काम, क्रोध ,लोभ, मोह, अहंकार सभी  भावों से प्रभावित होकर , रहकर सभी के गुण अनुरूप कहीं कोई उनकी न्यायी -अन्यायी , छल-छद्म, झूठ , पाखण्डीय, कर्मस्वरूपों में उनके भाव विचारों में सत्य असत्य का भाव विचार न करते न रखते हुये किन्हीं भी कर्मों के परिणामों के भाव विचार न करते हुये सत्कर्म दुष्कर्म क्या है क्या नहीं । अंधता, अज्ञानता ढोते हुये जीवन जीते हैं व रोग , दोष , बीमारी व परिणामों की दण्डीय व्यवस्था के शिकार होते अल्पायु में मृत्यु का वरण करते हैं तो मानव जीवन तन मन इंन्द्रियों की इच्छाओं आकांक्षाओं से ओत प्रोत होकर /रहकर संसार व सत्व – रज – तम गुणों से प्रभावित होकर तथा पंच विकारों में प्रवृत होकर संसार में जीवन जीते हैं और सुख -दुःख, कष्ट-आनंद दोनों रूपों -स्वरूपों का जीवन भोगते हैं , जीते हैं, मरते हैं ।

-डा०बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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