जिस मनुष्य ( नर नारी , स्त्रीपुरुष) का जीवन जीने का कोई एक सत्य लक्ष्य उद्देश्य नहीं होता वह ज्यादातर दिग्भृमीय भ्रांतियों का शिकार होकर कोई भी अपने जीवन कार्यों को सही ढंग की दिशा नहीं दे पाता है और ना ही सही पूर्ण परम सत्य जीवन जी पाता है। तथा ना ही उसके किन्ही भी सत्य कर्तव्य दायित्व चाहे राष्ट्रके प्रति हों, समाज के प्रति हों या घर परिवार के प्रति हों सभी मामलों में अपना असफल अशान्त जीवन बनाता है और जीता है। उसके बुद्धि विवेक, मन की अशान्ति, भ्रान्तियों में उलझकर, भ्रांतियां उसे अपने में उलझाकर कहीं का नहीं रखती हैं । व्यक्तिका सामाजिक कर्तव्य प्रजातंत्र , राष्ट्र में वोट डालना, मत देना, एक अच्छी राष्ट्र सत्ता के विस्थापन के लिए अच्छे सच्चे सभी को आत्मवत् समझने वाला , मानवतावादी , पूर्ण परम सत्य रूप में राष्ट्र की जनता के दुःख दर्द में हाथ बटाना, शामिल होना , जनमानस की कठिन दौरीय समस्याओं के निराकरण में भाग लेने की भाव विचारधारा रखने वाले व्यक्ति के चुनने की आवश्यकता होती है। परन्तु व्यक्ति (नर-नारी ,स्त्री-पुरुष ) कहीं जातिवादी, कहीं नाते रिश्तेदारी के माया मोहीय चक्कर में पड़कर गलत वोट करता, गलत वोट देता है अथवा गलत वोट दे देता है। जबकि यह आदमी के व्यक्तिगत जीवन में काफी अच्छी बुरी समस्याओं में राष्ट्र जन प्रतिनिधि की देश के नागरिक के प्रति कर्तव्य दायित्वीय निर्वहन में एक अति महत्वपूर्ण अहम भूमिका होती है। और देश में रहने पर तमाम शासकीय व घर परिवारीय वांछनीय समस्यायें नित्य प्रति ज्यादातर उत्पन्न होती हैं। ऐसे में कोई माया मोहीय भाव त्यागकर व्यक्तियों को अच्छे सच्चे मानवको चुनना चाहिए। वैसे भी कोई किसी का दुःख दर्द नहीं बांटता है , कोई मानवता भावीय भाव रख कर किसी अभावग्रस्त को रुपये पैसे की मदद नहीं करता । गरीब , भूखे, नंगे, निर्धन को नाते रिश्तेदार तक गरीब द्वारा कोई आशा अपेक्षा न करने , न रखने के बाद भी सम्पन्न आदमी निर्धन रिश्तेदार से प्रेम व्यवहार,नाता रिश्ता निभाने में कन्नी काट लेता है। रिश्ता तोड़ देता है। फिर क्या जाति ,नाता रिश्ता सब व्यर्थ व निरर्थक है। फिर भी मोह वश व्यक्ति अंधा हो कर गलत वोट करता है और गलत वोट डालता है। यह सब भ्रांतियो का ही रूप है, रंग है, भाव है। इसी तरह मोह में अंधे होकर नाते रिश्तेदार की, गली मुहल्ले की, गांव नगर की गलत असत्य अमानवीय, अन्याय परक, अत्याचारीय जोर जबर जस्तियों को न काट कर । जाति के नाम पर, रिश्तेदारी के नाम पर पास पड़ोसी, नगर , गांव, मुहल्लावासियों के पक्ष में असत्य ,झूठ , बदमाशी ,छल ,कपट ,अन्याय अत्याचार करने वाले के पक्ष में गवाही देना, फेवर करना , पक्षपात करना यह सब व्यक्ति के तन मन जीवन के भ्रांतीय शिकारता के सभी लक्षण हैं। कुछ तो इतने गलत कामों को सत्य बताकर इतना सपोर्ट कर देते हैं कि वह कर्म । ईश्वरीय परम सत्य सत्येश्वरीय सत्ता की नीति नियम विधान का दोषी हो जाता है। नतीजा जीवन व्यर्थ निरर्थक , दुःखदायी क्लेशकारक हो जाता है , बन जाता है और ताजीवन सुख शांति आनंद सब बहुत ही दूर हो जाते हैं और व्यक्ति कलेश करते हुए जीता है। कलेश में रहते हुए कलेश में ही मर जाता है। तो यह हैं मानव भ्रांतियां । अर्थात् यहाँ धरा का जीवन भी अज्ञानीय अंधेरे में नष्ट होकर दुःखदायी बनता है और रहता है। और ईश्वर दोषीय होने पर मृत्यु उपरांत क्या भोगना होता है या भोगना होगा । यह सब अज्ञात और जीवन रूपी विडंबना का सत्यस्वरूप हैं ये भ्रांतियां । हे मेरे प्रिय आत्मिक बंधुओं ,माताओं, बहिनों , बेटियों अपने को जातिवादी, नाते रिश्तेदारीय, पास पड़ोसीय , गली नगर मुहल्ले के लोगों की पहिचानीय माया मोहीय जीवन समाप्त करो और सत्य का सत्य से स्वागत करो । जिससे सत्य सुख शांति व जीवन आनंद मिले, प्राप्त हो और पूर्ण परम सत्य संसारीय , परमात्मीय जीवन सत्य रूप में सिद्ध हो सके और तुम्हे सत्य आत्मा शान्ति, आत्म शान्ति मिले, प्राप्त हो। भ्रान्तीय युक्त जीवन आत्म विनाश के अलावा कुछ नहीं है।
– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”




