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अनियमित , असीमित कामनाओं की इच्छाओं को पालने से व्यक्ति, मनुष्य (नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) नष्ट भ्रष्ट्र होकर नाथ को / आत्मविनाश को प्राप्त होते हैं। ।

– इच्छाओं के गुलाम मत बनिये । यह मनुष्य को दिग्भ्रमित कर दे । व्यक्ति का मन वृद्धिविवेक सब खो जाये और कब कहाँ किस दशा में प्राण निकलें । तन मन जीवन का ये ही मंजर होय । ।

– अपना हर कार्य आत्मा के सत्य से हस्तगत करो, सिद्ध करो। वही पूर्ण परम सत्य तन, मन- जीवन व इन्द्रियो के लिए सत्य सुखदायी व पूर्ण परम सत्य आनंददायी सिद्ध होगा ।

– एक समय में एक काम और अपना सम्पूर्ण फोकस सम्पूर्ण ध्यान, मात्र पूर्ण एकाग्र मन से उसी के नाम ।

डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री ”

 

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