सत्तासीन व्यक्ति १०० %   “सत्यधारी ” नही । तब तक क्या जन हितकारी योजनाएं महज एक नाटक?

रिपोर्ट  : डा० बनवारीलाल पीपर ‘शास्त्री’

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जब तक व्यक्ति व्यक्तिगत (नर-नारी, स्त्री-पुरुष) बाजारीय दुकानदार,राजनेता राष्टृ-प्रदेश नेता सत्ताधीश,शासकीय अधिकारी, शासकीय कर्मचारी, न्यायाधीश, चौथे  स्तंभ पत्रकार आदि लोभी लालची अपने घर परिवार,वंश, नाती रिश्तेदार मित्रादि के पक्षपाती व उनके लिए जोड़कर नीति-अनीति न देखते हुए सत्य असत्य का विचार न करने वाले

राष्ट्र की जनता का धन भ्रष्ट आचरण से खाने वाले रहेंगे,बेईमान,असत्य वादी, छल पाखण्ड से ओतप्रोत रहेंगे।

तब तक चाहे जितनी गरीबी हटाने वाली राज्य “राष्ट्र के विकास सम्बन्धी मानस से जुड़ी योजनाएं” हरदम विफल रहेगीं ।

सुपात्रों को लाभ अतिकम मिलेगा व अपात्रों को अति ज्यादा। पक्षपाती ,चाटुकार,चापलूस लोग असत्य को सत्य बताते रहेंगे और सत्य को असत्य।

तब तक पूर्ण सुधार देश में संसार में हो ही नहीं सकता।

इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत सत्य आचारणीय सत्य चरित्रीय सुधार चाहिए।

इसलिए दूसरे के दुख कष्ट को परम सत्य रूप में अनभूत (महसूस) करने वाला व्यक्ति तथा व्यक्ति में कोई लोभ लालच , मोह आसक्ति न हो।

उससे पूर्णतया मुक्त,परम सत्य न्याय का पूर्ण पोषक आत्मीयता, मानवता का पूर्ण परम सत्य पोषक मानने वाला,पालने वाला आत्मवत सर्वभूतेषु में संपूर्ण विश्वास रखने वाला कहीं कोई पक्षपात किसी भी रूप का किसी भी विषय का उसके तन मन में हृदय मस्तिष्क में अंश मात्र भी नहीं परम‌ ईश्वर, सर्वोच्च न्यायी सत्ताधीश से डरने वाला व्यक्ति ही सर्व हितैषी सिद्ध हो सकता है व सच्चे बदलाव ला सकता है ।

बाकी तो सब छल-छग्न, झूठ पाखण्ड और धोखा है। कुछ पंक्तियां हैं जो पथ प्रदर्शित करती हैं

“धड़कता हूं प्राणियों की धड़कनों मे मैं ही ,

दीन दुखियों के दिलों की सिसकनो मे मैं ही,

राम और रहीम उन्ही को मिला करते है,

प्राणियों से सत्य प्यार करना जिन्हें आता है।

छोड़ दे छल दम्भ को झूठ पाखण्ड और घमंड को,

प्राणियों से प्यार कर आत्मा का मूल सत्य हृदय से स्वीकार कर ,

जीवन तेरा सम्भल जाएगा , यथार्थ सत्य को पा जाएगा ।

उस अखिलेश्वर का सार यही है, परमेश्वर को पाने का मात्र मूल आधार यही है ।।

 

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