मुझे अपने द्वारा नौकरी व्यवसाय से किये गये उपार्जित धन सम्पत्ति का पता है अथवा पता होता है। कि मैने किन सात्विक-असात्विक स्रोतों से नैतिक अनैतिक स्वरूपों से अपने पास धन संग्रह अथवा धन अर्जित किया है। परन्तु दूसरों के धनार्जन के स्वरूप व स्रोत मुझे पता नहीं होता है ? इसलिये मैं अपने उपार्जित धन से व उससे क्रय किये गये धान्य , वस्तु, खाद्य पदार्थ, दृव्य अपने आहार भोजन व खानपान में ग्रहण करता हूँ और अन्य किसी का 99% नहीं। क्योंकि अन्य उपार्जित स्रोत सत्य नीतिगत सात्विक प्रकृतिगत उपार्जित प्रतीत नहीं होते हैं। महाभारत काल में भी बड़े-बड़े दिग्गज नेत्र विहीन धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन की सभा में बैठे थे , महारानी द्रौपदी का चीर हरण (शारीरीयवस्त्रा हरण) हो रहा था । उनमें महायोद्धा, इच्छा मृत्यु वरदानी महा आत्मा , महावीर व भगवान श्रीकृष्ण के भक्त श्री भीष्म पितामह भी बैठे थे, जबकि इन्होंने उस असत्य अनीतिपरक कृत्य में सामने होते हुए भी अपनी जिव्हा से वाणी द्वारा दोशब्द भी असत्य कृत्य के विपरीत विरोधात्मक स्वरूप में व्यक्त नहीं किये थे न कर सके थे जबकि वह दुर्योधन के पिता के चाचा थे, वीर थे, शक्तिवान थे उस अनीति परक कृत्य को रोक सकते थे | जब वे जीवन के अन्तिम छणों में तीरों से छिदा उनका शरीर सरसैया पर पड़ा था । तब महारानी द्रौपदी उन्हें देखने गयी थीं । तब तमाम सांत्वना वाक्यों के बाद द्रौपदी ने यह सवाल (प्रश्न) श्री भीष्म पितामह से किया था व पूंछा था कि दुर्योधन की भरी सभा में मेरा शारीरीय वस्त्राहण हो रहा था मुझे निर्वस्त्र किया जा रहा था । तब आप पितामह शान्त व चुप क्यों थे ? क्यों नहीं मेरे साथ होने वाले इस अनीति परक कृत्य में आपने अपनी वाणी से दो शब्द भी नहीं निकाले थे । क्यों नहीं व्यक्त किये थे। महात्मा भीष्म पितामह का उत्तर था । मैं उस समय अन्यायी अनीतिपरक उपार्जित धन धान्य नेत्रविहीन व सद् बुद्धि विहीन धृतराष्ट्र / दुर्योधन के राज कोष से प्राप्त भोजन आहार , खानपान आहार ग्रहण कर रहा था । जिस कारण मेरी जिव्ह्य से उस अनीति परक दुष्कृत्य में दो शब्द सत्य के अपनी वाणी से निसृत (बोल नहीं सके, निकाल नहीं सके ) नहीं कर सके। जिसके ही गलत स्वरूपों के परिणाम शरीर में बिंधे तीरों से जो रक्त प्रवाह हो रहा है, और भी गलत , अपराध श्रेणी में आने वाले दोषपूर्ण कार्यों को इस शरीर ने किया है । वे सब इस समय अपना-अपना हिसाब कर रहे हैं। जिससे मैं अन्तिम स्वर्गारोहण यात्रा अथवा परमात्मधाम जाने की यात्रा निर्मूल, निष्पाप व निष्कलंक स्वरूप में कर सकूं। तो यह है गलत कुधान्य खाने का और गलत कमाने का दुष्परिणाम अथवा ईश्वर (प्रकृति स्वरूपा) प्रदत्त असत्यकर्मों को करने का सत्य परिणाम ॥ “या काया से पातक होई । बिन भोगे छूटे नहिं सोई ॥”
“कर्म प्रधान विश्व रचि राखा । जो जस करे तो तस फल चाखा ॥ “
“कोऊ न काहू को सुख दुःख करि दाता । निज कृत कर्म भोग सब भ्राता ॥ “
“तो यह है कर्मों के बन्धन का सत्य परिणाम । जीवन में इस शरीर (काया) से जैसे कर्म वैसा ही परम पिता परम माता द्वारा आदान प्रदान ॥ “
– डा० बनवारीलाल पीपर “शास्त्री “





