• मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा एवं संबंधित प्रवचन सिर्फ अल्प प्राथमिक स्वरूपीय पाठशाला हो सकते हैं
  • संत सहहिं दुःख परहित लागी, पर दुःख हेतु असंत अभागी।”
  • परंतु व्यक्ति ( नर-नारी , स्त्री-पुरुष )द्वारा किए गए कुकर्मों, अपराधों, दोषपूर्ण कार्यों को क्षम्य करने या मुक्त करने के साधन बिल्कुल नहीं

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  • धर्म के परम सत्य सच्चे स्वरूप को आज तक या तो कोई जान नहीं पाया व प्रस्तुत नहीं कर पाया

रिपोर्ट: डा० बनवारीलाल पीपर “शास्त्री”

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  • संत सहहिं दुःख परहित लागी, पर दुःख हेतु असंत अभागी।”
  • आज के कुछ बुद्धिमान ज्ञानवान चतुर चालाक लोग उस सर्वेश्वर को भी आंखों में धूल झोंकने को तत्पर हैं

धर्म के परम सत्य सच्चे स्वरूप को आज तक या तो कोई जान नहीं पाया व प्रस्तुत नहीं कर पाया अथवा संसार समाज के लोगों को दिग्भ्रमित करके लूटने ठगने, हर रूप से व्यक्ति ( नर – नारी , स्त्री पुरुष ) का शोषण करने की मंशा चतुराई चालाकीयता के कारण धर्म के सत्य रूप को प्रस्तुत नहीं किया गया ।

धर्म का परम सत्य तात्पर्य,औचित्य है ।धारण करना, परम सत्य रूप में मानना,पालन करना, अपने चरित्र आचरण में उतारना, जीना,अपने जीवन कार्य व्यवहार, कार्य व्यापार में पूर्ण परम सत्य रूप में अपनाना, क्रियान्वन करना, क्रियान्वित करना। मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा एवं संबंधित प्रवचन सिर्फ अल्प प्राथमिक स्वरूपीय पाठशाला हो सकते हैं परंतु व्यक्ति ( नर-नारी , स्त्री-पुरुष )द्वारा किए गए कुकर्मों, अपराधों, दोषपूर्ण कार्यों को क्षम्य करने या मुक्त करने के साधन बिल्कुल नहीं। बहुसंख्यीय आबादी,समाज,जनता ने, लोगों ने उन्हें ही अपने द्वारा किए गये अपराधों, भूल गल्तियों को क्षमा का साधन मानकर अपने कल्याण का, मोक्ष का, उद्धार का, अपने द्वारा किये गये,किये जा रहे पापों के नाश का बहुत बड़ा रूप अपने दिल दिमाग में रखकर,मान कर देरखा है,दे दिया है। पाप, कुकर्म, दोषपूर्ण कार्य, लूट, ठगी,छल-छद्म,झूठ,पाखंड, हत्या, मर्डर, धोखा-दगा खूब करते रहो,अन्याय-अत्याचार खूब करते रहो जगत पिता जगत माता जगत जननी जगदीश्वर परम ईश्वर, सर्वोच्च सत्ता, परम सत्ता के न्याय, नीति, नियम, विधान की खूब अनदेखी करते रहो, परमात्मा की आंखों में धूल झोंकते रहो,अपनी चतुराई ,चालाकी का भरपूर प्रयोग उस सर्वेश्वर जो कण-कण में व्याप्त,जिसका नूर, रोशनी, प्रकाश पृथ्वी में, जल में,अग्नि में, आकाश में, वायु में,प्रकृति में व्याप्त है वह इन्हीं नेत्र स्वरूपीय आंखो से हर जगह हर पल हर क्षण अरबों आंखों से प्रत्येक व्यक्ति की सुकर्मीय,दुष्कर्मीय गतिविधि देख रहा है, निरख रहा है । परन्तु विशेष ईश्वर प्रदत्त बुद्धि विवेक ज्ञान जो मानव को समझ बूझ के लिये सच्चाई से जीवन जीने के लिए आत्मवत् सबके साथ जीव प्राणी मानव के साथ सद् व्यवहार करने के लिए प्रदान किया था I वह तो न करके अपनी कार्यप्रणाली में काम,क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार के वश होकर अपने ही आत्मिक भाइयों से जीव प्राणी मानवों से भरपूर छल छह्म, झूठ, पाखण्‍ड, धोखा-दगा, अन्याय अत्याचार के कृत्य अपने जीवन कार्य व्यवहार, जीवन कार्य व्यापार में कर रहा है और ईश्वर के नाम पर कुछ प्रवचन कर्ताओं का उपदेशकों पर मेरा मत है वे भी पंच विकारों की वशीभूतता  में आकंठ डूबे हैं, धन संपत्ति पद प्रतिष्ठा की अहंकारीय लोलुपता से वे भी अछूते नहीं हैं जो संसार जनों को समाज जनों को उपदेश देते हैं (अपने स्वार्थ सिद्धि के वशीभूत होकर)प्रवचन करते हैं दान,धर्म मंदिर में भजन कीर्तन करके, मात्र ईश्वर का नाम लेकर तर जाओगे, मोक्ष पा जाओगे, स्वर्ग पहुंच जाओगे।तुम्हारे सारे पाप, दुष्कर्म चाहे जो कुछ करते रहो,अन्याय अत्याचार करते रहो, लूट खसोट, धोखा दगा देते रहो, पद प्रतिष्ठा का दुरुपयोग भरपूर करते रहो,बस सोना चांदी, हीरा मोती, धन-संपत्ति छप्पन प्रकार के भोग, मिष्ठान मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा को भेंट करते रहो, पैसा किसी भी तरह कमाओ चाहे लूट से चाहे ठगी से, चाहे डकैती से बस उसका दसवां भाग मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा को चढ़ाते रहो,प्रवचन कर्ताओं को उपदेशकों को दान स्वरूप भेंट करते रहो बस हे जन मानसों तुम्हारे पास ईश्वरीय आनंद ही आनंद होगा। इन छल-छद्मीय शब्द वाक्यों में जगत अंधा बना हुआ हैI आंखें मीच के दिल दिमाग में ताला बंद करके इन छद्मीय-पाखंडीय प्रवचन कर्ताओं के, उपदेशकों के 100% असत्य को सत्य मानकर संसार,समाज, सारा जग अंधा होकर उस सर्वत्र व्याप्त परमात्मा अरबों नेत्रों वाला कण-कण में उसका प्रकाश रोशनी निगाह कहीं धरती के कण से, पेड़-पौधों की हरियाली से,जल सरोवर नदी तालाब के जल तत्व से, आकाश तत्व से, वायु तत्व से, प्रकृति तत्व से, वह प्रत्येक व्यक्ति का आचार चरित्र आचरण, जीवन कार्य व्यवहार, जीवन कार्य व्यापार सब देख रहा है।आज व्यक्ति ने अपनी चतुराई चालाकीयता होशियारी बुद्धि विवेक ज्ञान को इतना बढ़ा रखा है कि वह सर्व समर्थ, सर्वशक्तिमान,सर्वदाता, सर्व विधाता, सर्व सृजनहारा, सर्व पालनहारा, सर्व संहारण हारा जिसकी एक पलक में राई पहाड़ और पहाड़ राई हो जाता है। जो चींटी से लगाकर हाथी तक का आहार भोजन दाता है,उदर पूर्ति कर्ता है समग्र सृष्टि पटल का हर विषयों का आश्रय दाता है जिसके हम सभी पग-पग पर उसकी दया कृपा, स्नेह उससे भिक्षा के रूप में उससे अपने स्वकल्याण, परिवार कल्याण व सद् जन सर्व कल्याण हेतु मांगते हैं ,नित्य प्रति हाथ फैलाते हैं परंतु आज के बुद्धिमान ज्ञानवान चतुर चालाक लोग उस सर्वेश्वर को भी आंखों में धूल झोंकने को तत्पर हैं।हम उस सर्वदाता को सर्व विधाता को जो जगद् का दाता है, जगद् का भरता है, जगद् का पालन कर्ता है I उसे हम या कोई भी क्या खिला सकते हैं क्या चढ़ा सकते हैं l हम सभी उसके अपने जीवन सम्‍बंधी सभी कार्यों हेतु परम सत्य रूप में / सत्य रूप से यथार्थ में उसकी दया, करुणा, प्रेम आश्रय के भिखारी हैं । हम सही ढंग से उसकी नीति नियम विधान से जीवन जीना न सीखने वाले उसे क्या दे सकते हैं ? सोचो ?उस जगद् ईश्वर सर्वोच्च सत्ता जगद् पिता जगद् माता को।उसे सृष्टि जीव प्राणी मानवों से कुछ चाहिये भी नहीं । वह अपने स्वयं के परम सत्य त्याग तपश्चर्या,अपने सद् सत् सत्व गुणों से,सात्विकीय सत्याचरण स्वयं में ही सर्वशक्तिमान , सर्व समर्थ, सर्वदाता , सर्व विधाता, सर्व नियामक, सर्व संचालक, परम सत्य न्यायदाता,न्याय करता, समग्र सृष्टि संचालक, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, संहार करता वह सभी कुछ हैै। समग्र सृष्टि के समस्त विषयों का वह सर्व स्वरूप है।अगर उसकी परम सत्य पूजा, आराधना, साधना तप त्याग कुछ है तो वह मेरी दृष्टि से मेरे बुद्धि विवेक से ज्ञान, अनुभव, अनुभूति से।तो वह है उसकी परम सत्य नीति, रीति,भाव विचार का सत्य अनुशरण, सत्य पालन, सत्य धारण,सत्य मानन अपने जीवन चरित्र में ,अपने कार्य व्यवहार आचरण में ,अपने जीवन कार्य व्यापार में परम सत्य का पालन , सद् आचरण, पंच विकारीय अपनी मनोभावीय प्रकृति प्रवृत्ति पर परम सत्य पूर्ण रूपेणु अंकुश, आत्म नियंत्रण। आत्मवत् प्रत्येक जीव प्राणी, मानव को मानते हुये अपने ऊपर परम सत्य आत्मनियंत्रण रखते हुये किसी के भी साथ अन्याय अत्याचार नहीं, छल छद्म,झूठ पाखंड,धोखा-दगा नहीं, लूट खसोट नहीं। निर्विकार, निर्लिप्त,निश्च्छल,निष्कामीय, निष्कपटीय, निर्मोही, निर्लोभीय, निरहंकारी (अहंकार रहित )जो परमेश्वर के स्वयं के गुण हैं। वे सद् गुण स्वरूप मानते हुए धारण करते हुए अपनाते हुए प्रत्येक व्यक्ति (नर-नारी स्त्री-पुरुष) अपना जीवन संचालन करें कहीं कोई कूटनीति नहीं, कहीं कोई राजनीति नहीं, कहीं कोई कुटिल नीति नहीं, कहीं  कोई छल नीति नहीं,कोई कपट नीति नहीं। पूर्णतया निश्च़छलीय स्वरूप मानव का हो। परमेश्वर जगदीश्वर कहीं कोई धन धान्य,हीरा मोती, सोना चांदी,छप्पन भोग मिस्ठान उसे कुछ भी नहीं चाहिए बस संसार समाज मानव जीवन प्राणी समग्र सृष्टिपटेल में प्रेम वत रहे, चलें, मिले, जीये। जैसे एक परिवार के माता-पिता अपने कई बच्चों को एक साथ प्रम मई स्नेहमयी धारा में रहने, चलने, बहने की इच्छा अपेक्षा परमेश्वर से करता है उसी तरह जगत पिता जगत माता जगदीश्वर अपने समग्र सृष्टि पटल पर विद्यमान अपने श्रजन अपनी उत्पत्ति को एक तार एक डोर एक प्रेम बंधन में रहने, चलने, दौड़ने, की हर पल हर समय  अपेक्षा करता व रखता है। वह बस मानव से इसी रूप स्वरूप के वरण का प्रेमी है, स्वादी है, भावि है, अपेक्षि है, और उसे मानव से कुछ नहीं चाहिए सत्य मायने में। समग्र सृष्टि पटल के सत्य तत्त्वेत्ताओं ने परम सत्य को अपनी रचनाओं में सद् सत् सत्य शब्दों के रूप में पिरोया भी है अर्थात व्यक्त किया है।

  • “सब सों ऊंची प्रेम सगाई प्रेम के वश पारथ रथ हाक्यो भूल गयो ठाकुराई ।
  • राजसु यज्ञ युधिष्ठिर कीन्ह्यो ता मे जूठ उठाई, सब सों ऊंची प्रेम सगाई ।
  • दुर्योधन घर मेवा त्यागी, साग बिदुर घर खाई । सब सों ऊंची प्रेम सगाई।”
  • मैं भगतन हाथ बिकाऊं, जित बैठारे तितही बैठूं, बेचे तो बिक जाऊं।
  • मांगू नहिं कछु दाम तिनतें, जो देवे सो खाऊं। मैं भगतन हाथ बिकाऊं।” 

(भगत की सत्य व्याख्या है परमेश्वर की परम सत्य रीति नीति का परम सत्य पालन करना, जीवन आचरण कर्म व्यवहार में परम सत्य अनुशरण करना।”

“संत सहहिं दुःख परहित लागी, पर दुःख हेतु असंत अभागी।”

संत वे है जो ईश्वर की रीति नीति पर चलते हुए दूसरों की निष्काम भाव से लोगों के दुःख कष्ट हरने में उनकी सत्य सेवा सुश्रूषा सहयोग व मदद करते हैं। असंत वे है जो परमेश्वर के न्याय नीति को धता बता कर अपने ही आत्मीय जनों पर अन्याय अत्याचार करते हैं। परंतु वे ईश्वरी सत्य न्याय नीति से कभी नहीं बचते हैं इसलिए ऐसे लोग अज्ञानी व अभागी है।

“कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करई सो तस फल चाखा।।” कोऊ न काहु को सुख-दुख करि दाता। निज कृत कर्म भोग सब भ्राता।।”  “निर्मल जन मन सोहि मोहि भावा, मोहि न कपट छल छिद्र दुरावा।।” (श्रीरामचरितमानस) कबीर मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर। पाछे लागे हरि फिरे कहे कबीर कबीर।।” राम न मारें काहुए, दोषी नहींयां राम। आप ही से मरिजात है करि करि खोटे काम।।”  “कहता हूं काहे जात हूं बात सुनो हमार। जाका गरि तुम आज काटिहो, कल काटिहै तुम्हार।।” धर्म लोगों की सेवा में है। तसबीह या मुसल्लाह में नहीं।। ( शेख सादी )  “कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद लाइ चुनाय। तापर चढ़करि मुल्ला बांग दे रहा, क्या बहिरा हुआ खुदाय।।  परमेश्वर बहरा नहीं है। “करता खोटे काम है और मंदिर में घंटा देय बजाय। ऐसे छल छद्म की ईश्वर सुनता नाय।।” असत्य धारा में बहने वालों का घंटा बजाने से वह सुन नहीं लेता है।  “प्रेम के सिवा तू किसी परमात्मा को न मान। (हजरत मूसा) “संपूर्ण मानवता एक परिवार है अल्लाह उन्हीीं से प्यार करता है, जो उसकी कायनात मानवता से प्यार करता है। (मोहम्मद साहब) “जिस जगत पिता को किसी से कोई सेवा पूजा कराने की कोई आवश्यकता नहीं है, मनुष्य उसकी तो सेवा पूजा करता है और उसके प्यारे पुत्र जगत जीव जो नाना प्रकार के अभावों से ग्रसित है उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देता है। आस्तिकता और ईश्वर भक्ति की यह कैसी विडंबना है। (लियोनार्ड चेशायर) “मनचाही होवे नहीं, प्रभु चाही तत्काल। बलि चाहियो स्वर्ग को, प्रभु भेजो पाताल।।” (सद ग्रंथ)  ” न वह रीझे जप तप कीन्हे, न आतम के जारे। न वह रीझे धोती टांगे न काया के पाखारे, दाया करे धर्म मन राखे, ह्रदय रहे उदासी, अपना सा दुख सबका जानी ताहे मिले अविनाशी (संत मलूक दास)  ” नेत्रों को खोल ले और सत्य को जान ले, प्राणियों में ही है मेरा निवास यह निश्चित तू पहचान ले। धड़क रहा हूं प्राणियों की धड़कनों में मैं ही, दीन दुखियों के दिलों की सिसकनो में मैं ही राम और रहीम उनको ही मिला करते हैं प्राणियों से प्यार करना जिन्हें आता है। छोड़ दे छल दम्भ को झूठ पाखण्ड और घमण्ड को प्राणियों से प्यार कर आत्मा का मूल सत्य ह्रदय से स्वीकार कर जीवन तेरा संभल जाएगा यथार्थ सत्य को पा जाएगा उस अखिलेश्वर का सार यही है, परमेश्वर को पाने का मात्र मूलआधार यही है।। (गुरु पिता गुरु माता)

– डा० बनवारीलाल पीपर “शास्त्री”

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