टीम इंडिया का वह क्रिकेटर जिसने यूपीएससी पास कर वर्दी भी पहनी

हर क्रिकेटर का सपना होता है तिरंगे के नीचे खेलना।   हर युवा का सपना होता है यूपीएससी पास करना।
लेकिन कोई एक इंसान दोनों सपने जी ले—ऐसा कम ही होता है।
भारतीय क्रिकेट में एक ऐसा नाम है, जिसकी कहानी सिर्फ रन और रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। यह कहानी है अमय खुरासिया की—जिसने एक हाथ में बैट पकड़ा और दूसरे हाथ में देश की सेवा की जिम्मेदारी।
🎯 डेब्यू से पहले ही बन चुके थे अफसर
अमय खुरासिया ने 1999 में श्रीलंका के खिलाफ भारत के लिए डेब्यू किया, लेकिन उससे भी पहले वे देश की सबसे कठिन परीक्षा—यूपीएससी—पास कर चुके थे।
आज भी (22 फरवरी 2025 तक) वे भारतीय कस्टम्स और सेंट्रल एक्साइज विभाग में इंस्पेक्टर के पद पर सेवाएं दे रहे हैं।
तेज़ तर्रार बल्लेबाज़, तेज़ शुरुआत
बाएं हाथ के आक्रामक बल्लेबाज अमय खुरासिया ने घरेलू क्रिकेट में रन का अंबार लगाया।
डेब्यू मैच में ही श्रीलंका के खिलाफ तेज़ अर्धशतक—मानो टीम इंडिया को नया मैच-विनर मिल गया हो।
वे 1999 के वर्ल्ड कप स्क्वाड का हिस्सा भी बने, लेकिन किस्मत ने वहां उनका साथ नहीं दिया—एक भी मैच खेलने का मौका नहीं मिला।
📉 जब मौके कम पड़े
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उनका सफर सिर्फ 12 वनडे तक सीमित रह गया।
आखिरी बार जुलाई 2001 में टीम इंडिया की जर्सी पहनी—और फिर दरवाज़े बंद हो गए।
जहां अंतरराष्ट्रीय आंकड़े साधारण रहे, वहीं घरेलू क्रिकेट में वे मध्य प्रदेश के भरोसेमंद रन-मशीन बने—
119 फर्स्ट क्लास मैच
7304 रन
21 शतक
औसत 40 से ज्यादा
🎓 हार नहीं मानी, रास्ता बदला
2007 में संन्यास लेते समय उन्होंने माना कि राष्ट्रीय टीम में उन्हें उतने मौके नहीं मिले जितने मिलने चाहिए थे।
लेकिन यही वह मोड़ था जहां अमय खुरासिया रुके नहीं, बदले।
🧠🏏 कोच बनकर रचा इतिहास
आज अमय खुरासिया सिर्फ पूर्व क्रिकेटर या अफसर नहीं, बल्कि सफल कोच भी हैं।
अक्टूबर 2024 में केरल क्रिकेट टीम के हेड कोच बने—और इतिहास रच दिया।
उनकी कोचिंग में केरल पहली बार रणजी ट्रॉफी के फाइनल तक पहुंची।
खिताब भले न मिला हो, लेकिन टीम की दिशा बदल गई—और यही असली जीत है।
सबक सिर्फ क्रिकेट का नहीं
अमय खुरासिया की कहानी यह बताती है कि—
सपने टूटें तो मंज़िल नहीं बदलती, रास्ता बदल जाता है।
जहां ज्यादातर खिलाड़ी एक पहचान के बाद खो जाते हैं, वहीं अमय खुरासिया ने खुद को बार-बार साबित किया—
क्रिकेटर, अफसर और अब कोच के रूप में।
बैट से शुरू हुई यह यात्रा संविधान तक पहुंची… और अब भविष्य के क्रिकेटरों को गढ़ रही है।

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