राजसत्ता राजतंत्र गठन में भाग लेने वाले मानवों को वेतन विहीन , भत्ते विहीन प्रजा सेवा / परमात्मा सेवा घोषित करते हुए निःशुल्क त्याग मयी पूर्ण परम सत्य सेवा करनी चाहिए । इस पुनीत कर्म में कल्याणमयी कर्म का नाम देकर इसे ही परमेश्वर परम सत्ता का जप , तप , तीरथ, गंगा – गंगोत्री, यमुना-यमुनोत्री, सरयू-सरस्वती , नर्मदा मंदाकिनी सरिताओं का स्नान घोषित करना चाहिए । यह सत्य तत्त वेत्ता , सत्यबुद्धिविवेकधारी मानवों की सत्य सद्सत् उपज होगी। जो लोग सत्य रूप में पूर्ण आर्थिक सम्पन्न हो वह सद् ग्रहस्थ चालीस – पचास की उम्र के चलते अपने घर परिवारीय कर्तव्य दायित्व पूरे करते हुए फ्री स्वतंत्र होते रहते हुए  राजसत्ता तंत्र में सत्तारूढ़ प्रजा सेवा का उद्देश्य लेकर पंच विकारीय (काम ,क्रोध , लोभ , मोह ,अहंकारीय ) भाव त्याग कर विनम्र , मधुर , सहज व सरल आत्मवत् सर्वजनों को परमेश्वरीय सृजन का स्वरूप मानकर । प्रजा राजा की सेवाभावी हो और राजा , राजतन्त्र प्रजा का सेवा भावीय हो। इस तरह देश भारत सुखशांति, सर्व आनन्दीय राष्ट्र होगा । सर्वसुखी राष्ट्र होगा। ऐसे राजतन्त्र गठित स्वरूप में जब सर्व प्रिय लोग चुने जायेंगे तो उन्हे कोई जीवन भय व जान जोखिम के कोई भय नहीं होंगे। तो खास व्यक्तियों की सुरक्षा की कोई जरूरत नहीं रहेगी । जिससे वीआईपी सुरक्षा के खर्च से देश मुक्त होगा व मुक्त रहेगा तथा मुक्त बनेगा । इस तरह भारत के राजतन्त्र के व्यर्थ के खर्चे कम होंगे तथा देश को विदेशों से कर्ज नहीं लेना पड़ेगा । भारत सत्ता में सत्ता तन्त्र वेतन विहीन , भत्ता विहीन , वीआइपी व्यक्तिगत सुरक्षा व्यय विहीन रूप भारत देशको अति अति विकसित राष्ट्र बनायेगा । जिसका विश्व राष्ट्र श्रंखला में विकास की चरमसीमा पर अग्रिणी देशों में भारत की गिनती होगी और भारत तथा भारत का जनमानस पूर्ण आनंद , परम आनंद में विहार करेगा। हमारे राजतंत्रीय सत्ता रूप नेता व भारत का जनमानस सत्य आनंद सरोवर में गोता लगायेगा । फिर सत्य मायने में विश्व में भारत हर स्तर पर सर्वोपरि आर्थिक सम्पन्नता में परिपूर्ण राष्ट्र होगा और फिर अवश्यही सत्य रूप में विश्व के दूसरे देश भारत को सद् आचारीय सत्य नीति से ओत प्रोत सर्वकल्याणीय विश्व कल्याणीय सत्यमानव जनीय विश्वबंधुत्व, विश्व मैत्रेयी स्वरूप धारी स्वीकार करके सर्वगुरु व विश्वगुरु रूप में आत्मिक हृदय से विश्व के समस्त देश स्वीकार कर लेंगे। और भारत महान होगा।

एक तत्वदर्शीय महामानव आदिपुरुष महामना श्री विनोवा जी जिन्होंने भारत के भूमिहीनों के लिए भू – दान बड़े- बड़े भू स्वामियों के दिल दिमाग को जीतकर उन्हे भूमिहीनों के प्रति उदार स्वरूप का धनी बनाकर उनका हदय अपने ही अत्मिक भाइयों के लिए उनकी भूमि गरीबों को बांटने व उन्हे सही जीवन जीने देने के लिए प्रेरित किया था। अर्थात् उनकी भूमि भूमिहीनों को देने के स्वरूप को भूदान यज्ञ का नाम दिया गया था। उस सर्व हितैषी सर्व लोगों के दुःख को सुख में बदलने के प्रयास कर्ता का नाम था संत विनोवा भावे देखें उनके भाव विचारों का दर्शन राजसत्ता और जनतंत्र के विषय में – “समाज में किसी भी सत्ता का शासन न हो । सद् विचार का अनुशासन हो । व्यक्ति की सब शक्तियाँ समाज को समर्पित हों ,समाज की ओर से व्यक्ति को विकास के अवसर प्राप्त हों । ईमानदारी से शक्ति के अनुरूप की गयी सब तरह की सेवाओं का नैतिक , सामाजिक और आर्थिक मूल्य समान माना जाये । “

फ्रांस, जर्मनी, डेनमार्क, स्वीडन जैसे दुनिया के देशों में मुख्य शासनाधीश (राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ) बगैर कोई सुरक्षा लिए सामान्य मानव की तरह बाजारों में निज प्रयोगी वस्तुओं को सामान्य मानव की भांति अकेले या परिवार के साथ सामान्य नागरिक की भांति खरीदते हुए देखे जाते हैं। कहीं कोई सुरक्षा तंत्र साथ नहीं।

– डा० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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