• मन का गुण और स्वभाव बहु विषयों की ओर जाने वाला

  • परम सत्य सुख-शांति आनंदमयी जीवन जीने के लिये आत्मा के स्वरों को सम्पूर्णतया सुनना और मानना चाहिये।

रिपोर्ट  : डाॅ०बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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  • सात्विकीय प्रवृत्ति का गुण स्वरूप-

  1. निर्विकार,

  2. निश्चछल,

  3. निष्कामी,

  4. निष्कपटीय,

  5. निर्मोही,

  6. निर्लोभी,

  7. निरहंकारी

जीवन तब तक चक्की पचीसी है जब तक व्यक्ति मन की बात मानकर जीवन संचालन करता है क्योंकि मन का गुण और स्वभाव बहु विषयों की ओर जाने वाला चंचल स्वरूपीय है।

मन ही दौड़ाता है मन ही तन में जीवन में इच्छाएं पैदा करके फिराता है और सही व गलत का सत्य और असत्य का आकलन न करते हुए व्यक्ति को भटकाता है और व्यक्ति सत्य अच्छे कामों के साथ असत्य और गलत बुरे काम कर बैठता है, जिस कारण वह दुःख और संकट में पड़ता है तथा दुःख संकटों के कष्टों को भोगता है।

व्यक्ति को (नर-नारी, स्त्री-पुरुष को ) परम सत्य जीवन संचालन के लिये और परम सत्य सुख-शांति आनंदमयी जीवन जीने के लिये आत्मा के स्वरों को सम्पूर्णतया सुनना और मानना चाहिए तथा मात्र सत्व गुण धारण करके सात्विकीय प्रवृत्ति से अपना जीवन संचालन करना चाहिए एवं जीवन के समस्त कार्य व्यापार करना व रखना चाहिए।

सत्व गुण व सात्विकीय प्रवृत्ति का गुण स्वरूप- निर्विकार, निश्चछल, निष्कामी,निष्कपटीय, निर्मोही, निर्लोभी, निरहंकारी।।

व्यक्ति उपरोक्त गुणों को धारण करने से निर्विघ्न  और  परम सत्य  सुख शांतिमय आनंदमय जीवन पाता है व जीता है।                                                   –डाॅ०बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

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