जीने में तमाम कष्ट युक्त शारीरिक मानसिक दुःखदायी वेदनापरक भूचाल जीवन न जाने क्यो आ रहा है?

रिपोर्ट  : – डा ० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

हम सभी न सही जीवन जी रहे हैं। न सही (सत्य) जीवन जी पा रहे हैं , न ही सही (सत्य) जीवन बना रहे हैं और न ही सही सत्य जीवन बना पा रहे हैं ? हम सभी अपने तन मन की भ्रम भवाटकीय मयी भूल भुलैया युक्त भ्रांतियों के कारण तथा संसारीय सामाजिकीय मुखिया बने , ठेकेदार बने , सत् असत् (सत्य-असत्य ) बनायी गयीं नीतियों, नियमों , विधानों का निर्धारण कर उन्हे प्रथाओं का स्वरूप देने से । संसारीय , समाजीय, मानव समुदाय ( नर -नारी , स्त्री -पुरुषों ) को उनको अपने जीवन में उतारने , चलने , चलाने संचालन करने को जबरन एकीय एकता इकट्ठे बल का जबरन बल का प्रयोग करके अपने बनाये ( चाहे वे सही हों, सत्य हों या ना हों ,भले ही असत्य हों , गलत हों दुख़दायी सिद्ध होने वाले हों ) गये नियमों , नीतियों , रीतियों पर चलने को बाध्य करने के कारण और वैसी ही सामाजिक भ्रांतियों को एकता युक्त ठेकेदारों की मनोसोचीय , मनोवृत्तीय सोच , सत्य को असत्य बताकर , असत्य को सत्य बताकर , बनाकर जबरन थोपने कारण । ? व्यक्ति को व्यक्तिगत जीवन में गलत को ,असत्य को मानने ,अपनाने, प्रश्रय देने से ही व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन जीने में तमाम कष्ट युक्त शारीरिक मानसिक दुःखदायी वेदनापरक भूचाल जीवन जीने में आ रहा है , चल रहा है । सामाजिक सत्य  की विस्थापना के नाम से । आदि काल से आज तक चलाया जा रहा है , थोपा जा रहा है।

यही कारण है व्यक्ति ( नर -नारी , स्त्री – पुरुषों) के व्यक्तिगत जीवन में तमाम भ्रम भवाटिकी , भूल भुलैया युक्त भ्रांतियों ने जन्म ले रखा है । जिन्होने मानव जीवन सत्य सुख , शान्ति , आनन्द , आत्मसंतोष से वंचित शंका संदेह (सत्य / असत्य ) के बीच में भ्रमा रखा है।

मनुष्य जीवन दुःखों के, कष्टों के,अंधेरों के थपेड़ों में ना सुख चैन की सांस ले पा रहा है और ना ही सुख चैन से जीवन कार्य पूर्ण सही , पूर्ण परम सत्य रूप में अथवा जीवन कार्य व्यापार ना ही सही सत्य ढंग से कर पा रहा है। वाह ! रे संसारी मानव ,जीवन वृत्ति । जिसे मानवों ने ही मानवों के लिए (संसारीय समाजीय मुखिया बने ठेकेदारों ने ) कष्टदायी स्वरूप में बना रखा है, लाद रखा है, थाप रखा है।

यह कैसी विडम्बना है । मानव (नर – नारी, स्त्री-पुरुष ) जीवन , मानव जीवन कर्म , कार्य व्यापार , कर्मधर्म | हे मानव इस पूर्ण सत्य को मान जाओ । ” बिछाते नहीं फूल किसी के लिए तो किसी के लिए न कांटे बिछाओ । किसी का दुःख दर्द दूर करने की यदि सामर्थ्य नहीं है, तो किसी के जीवन में किसी भी प्रकार की कोई बाधायें न खड़ी करो , न उत्पन्न हों न उपजाओ । । “ हम सभी लोग भारत में व अन्य सुदूर देशों में सत्य – असत्य को न पहिचानने की भूल भुलैया शंका संदेहों में विभिन्न विभिन्न भ्रांतियों में फंसे , उलझे मात्र इसलिये हैं । जहां कुछ लोगों ने मानव समुदायों का रूप देकर एकता बनाकर , एकजुटता अपनाकर इन अन्धविश्वासियों ने धर्मान्धता का मुखौटा स्वयं पर लगाकर , चढ़ाकर धर्म अधर्म की व्याख्या अपने मनोसोचीय रुप से निर्धारित करके संसार समाज के लोगों को दिग्भ्रमित करके ,संकट में डालकर अपने मनोसोचीय स्वरूप धर्मान्ध ठेकेदार, मुखिया बनकर, सत्-असत् का , सत्य – असत्य का जीवन का काला व्यापार अपने मनोसोचीय ढंग से चला रहे हैं और इसकी अग्निस्वरूपीय आंच मानव जीवन ( नर -नारी, स्त्री – पुरुष को) को भस्म करने वाली मानवजीवन को, विश्वजीवन को कहीं काम के स्वरूप में, कहीं क्रोध के स्वरूप में, कहीं लोभ के स्वरूप में, कहीं मोह के स्वरूप में , कहीं अहंकार के स्वरूप में झुलसा रही है । विश्व में त्राहि – त्राहि मचा रही है , विश्व मानवी सृष्टि मानवों को प्रभावित कर रही है । इस कूटनीति , कुटिल नीति , कपटनीति ,  ऐन केन प्रकारेण नीति, साम,दाम,दण्ड, भेद नीति नें समग्र सृष्टि पटल में मानवजीवन , जीव,प्राणी जीवन में उथल पुथल मचा रखी है। त्राहि-त्राहि के स्वर चहुं ओर गूंज रहे हैं आवाजें आ रही हैं ।

बचाओ – बचाओ – बचाओ । रुको, रुक -जाओ -रुक जाओ – रुक जाओ ।

अपने ही अपने जैसी चाह रखने वाले अपने आत्मिक भाई , अपनी ही आत्मिक मातायें , बहिनें , बेटियों , पुत्र बधुओं पर अन्याय अत्याचार करने से , धोखा , दगा , झूठ , छल प्रपंच , छद्म पाखंड , लूट , मारामारी, बलात्कार , हत्या मर्डर करने से ।

लोगों को परम सत्ता सर्वोच्च सत्ता ईश्वरीय सत्य नियम नीति से विधान से जीने दो , मरने दो । अरे तुम तो परमेश्वर से सत्य बुद्धि विवेक ज्ञान प्रकाश जीवन अनुभव अनुभूति महसूस करने वाले सद् सत्य मानव हो । तुम तो आत्म विनाशक सर्वविनाशक तो ना बनो । जागो हे मानवों जागो। सम्हालो अपने को, असत्य से, अंधकार से , अज्ञान से, अन्याय अत्याचार करने से। अन्यथा यह असत् असत्य ,गलत चलन ,गलत धारा , श्रंखला । ईश्वर प्रदत्त सहज ,सरल ,निष्पाप , निष्कलंक मानवजीवन को पूर्ण आयु, पूर्ण सुख चैन शांति आनंद से आदिकाल से आजतक पापमयी, कुटिल कपटीय , अन्याय अत्याचारीय रुप से सृष्टिपटल पर मानव मानव में खून की होली आज तुम किसी के साथ और कल वह तुम्हारे साथ बस यही श्रृंखला सदैव मानव जीवन में घातीय स्वरूप से मानव का जीवन मानव के द्वारा, अपने आत्मिक भाइयों का जीवन अपने आत्मिक भाइयों द्वारा विनष्ट होता रहेगा, विनाश को प्राप्त करता रहेगा । सुख चैन से कोई भी पक्ष मरने वाला , मारने वाला, लुटने वाला – लूटने वाला , ठगने वाला – ठगानेवाला ,अन्याय अत्याचार करने वाला -अन्याय अत्याचार सहनेवाला कभी चुप नहीं बैठेंगे और सर्व विनाश का क्रम सदैव चलता रहेगा और धरती से मानव जीवन का मानव प्राणों का सुख चैन, आनंद शांति, सत्य पूर्ण आत्मसंतोषीय जीवन कोई भी नहीं जियेगा और ना ही सत्य जीवन जीने की अनुभूति, अहसास, महसूस कभी भी नहीं कर पायेगा और ना ही करेगा । हे बुद्धि विवेक के सत्यपिटारे मानव आंखें खोलो, सत्यजीवन बनाओ और सत्य जीवन अपनाओ व सत्य जीवन जिओ ।  ” जागो रे जिन जागना , अब जागन की बार । तब क्या जागे मानवा जब मर गये , सो गये पैर पसार ॥ ” ” सुख से जिओ और अपने ही आत्मिक भाइयों को सुख से जीने दो ॥ ” हे मानव इस भव प्रपंचीय पाप कर्मोंकी ओर पापाचरण की ओर प्रवृत्त करने वाले पांच विकारों को काम, क्रोध , लोभ , मोह , अहंकार की आबद्धता उनके प्रति आकर्षण की फांस से हे मानव अपने को मुक्त करो । यही पूर्ण परमसत्य ईश्वरीय , परमेश्वरीय , सर्वोच्च सत्ता एकेश्वरीय प्रियता की पूर्ण परमसत्य पूजा, साधना , आराधना, जप-तप , त्याग – तपश्चर्या यही है।अगर जिस दिन इस पूर्ण परम सत्य को जान लोगे , मान लोगे ,अपना लोगे अपने जीवन कर्म में,  तन मन जीवन इंद्रियों के कार्य व्यापार में और सहज सरल पारस्परिक चाल चलन में, आचरण चरित्र में । तो उस सर्वेश्वर सर्वेश्वरी की दया कृपा, स्नेह, करुणा , प्रेम के पाने के सत् पात्र बन जाओगे और समग्र सृष्टि पर पारस्परिक रूप में सुख , शांति , आनंद मिलेगा व प्रत्येक को परम सत्य आत्मसंतोष की सांस मिलेगी । सभी लोगों को प्रत्येक का पारिवारिक जीवन सुख , शांति , धन ,वैभव ,संपन्नता, कार्य ,व्यापार रोजगार , ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होगी । विश्व के जनमानस का रूप रंग ही पूर्ण परम सत्य सुख शांति चैनमय होगा , रहेगा । अशांति , असंतोष , दुख ,कष्ट का ,गहरी वेदनामयी दुख -दर्द का अंत होगा । दुख कष्ट अंश मात्र भी किसी हृदय में नहीं व्यापेंगे । ईश्वरीय परम सत्ता  की चाह युक्त सृष्टि पटल पर साम्राज्य होगा । सुख शांति आनंद की चहुओर गंगा बहेगी । सत्य सत्येश्वरीय ईश्वर राज्य का सत्य विस्थापन होगा व रहेगा । हां आज स्वर्ग पाने , स्वर्ग जाने की कि कल्पना में जो लोग खोये स्वर्ग आने जाने की इच्छा पाले हैं । स्वर्ग है भी या नहीं अथवा कोरी कल्पना मात्र है । कौन स्वर्ग गया , कौन स्वर्ग से वापस आया , किसने स्वर्ग का हाल चाल बताया । यह सब मात्र कल्पनाएं है जो पूर्णतया अज्ञात हैं । लेकिन मैं पूर्ण अपनी आत्मेश्वरी , अपनी आत्मा के निसृत अन्तःकरणीय दिशा दर्शनीय स्वरों , आवाज को सुनता हुआ यह सत्य दावा करता हूँ कि जिस दिन मनुष्य ( नर-नारी , स्त्री-पुरुष ) ” आत्मवत् सर्वभूतेषु “  , “ममेवांशे जीवलोके सर्व भूते सनातना : “  सभी हमारे ही अंशी हमारे ही वंशज हैं । जिस दिन व्यक्ति मान लेगा कि अन्य कहीं कोई अन्य कोई दूसरा नहीं है। और पंच विकारों ( काम, क्रोध , लोभ, मोह , अहंकार ) पर अपना पूर्ण परम सत्य आत्म नियंत्रण कर लेगा तथा पूर्ण परम सत्य आत्मसंयम बना लेगा और सत्वगुणीय सात्वकीय प्रकृतिगत प्रवृत्ति बना लेगा और अपने जीवन ( तन -मन, इन्द्रियों ) के कार्य व्यापार में अपना लेगा, आत्मआचरण और चरित्र में सत्य रूप से जी लेगा। तो इस श्रृष्टि धरा पर यही मृत्युलोक ,स्वर्गलोक जिसकी कल्पना सुख शान्ति पूर्ण परम सत्य आनंद व सम्पूर्ण सुख , वैभव, ऐश्वर्य , भोग, सम भोग, पारस्परिक सत्य प्रेम  समग्र सृष्टि के समग्र सुखमानव ( नर-नारी , स्त्री -पुरुष , बाल गोपाल , मातायें , बहिनें , बेटियां , पुत्रवधुएं ) इसी सृष्टि धरातल पर पायेंगी , उठायेंगी और जियेंगी । यही समग्र सृष्टि जिसे हम सभी आज सत्य बुद्धि विवेक , ज्ञान ध्यान ,भाव विचार, शारीरिक मानसिक क्रियाओं प्रक्रियाओं से देख रहे हैं , अनुभूति कर रहे हैं , सुख दुःख ,कष्ट , कलेश , कलह ,आनंद रुप में । वह सब समाप्त होते हुए मात्र स्वर्ग आनंद का शाश्वत स्वरूप में प्रत्यक्ष अपने तन – मन – जीवन से प्राप्त स्वरूप में सत्य सुख भोग स्वरूप में पायेंगे , जियेंगे व एहसास महसूस अनुभूत करेंगे । इसी सृष्टि धरातल पर हम सभी के बीच स्वर्ग होगा I I

ना सुख काजी पंडिता (विद्वान ) ना सुख भूप भया ।

सुख सहसा ही आवसी पंच विकारीय अति गलत रुप जीवन से गया ॥

चाह चिंता का रुप है चाह सकल दुःख खान । अगर गलत चाह मानव जीवन में न होती तो मिट जाता सारा जीवन का घमासान ॥

 – डा ० बनवारी लाल पीपर “शास्त्री”

Share.